बरेली। सिर्फ तीन घंटे में ही लली की जिंदा रहने की सारी उम्मीदें ध्वस्त हो गईं। शाहजहांपुर के बंथरा से इन्हीं उम्मीदों के बूते वह अपने पैरों पर चलकर बरेली पहुंची थीं लेकिन कई अस्पतालों के चक्कर काटने के बावजूद उन्हें इलाज मयस्सर नहीं हो पाया। आखिरी उम्मीद के तौर पर परिवार के लोग उन्हें तीन सौ बेड अस्पताल लाए लेकिन जब तक यहां एक बेंच पर लिटाकर ऑक्सीजन लगाई जाती, तब सांसों की डोर उनके हाथों से छूट गई।
सिस्टम से लेकर सरकार तक ऑक्सीजन और बेड की कमी न होने तक के दावे कर रहे हैं लेकिन हकीकत इसके उलट है। अस्पतालों में हर रोज जिस तरह कई-कई लोगों की सांसें टूट रही हैं, उससे साफ है कि हालात काबू से निकल चुके हैं और सिस्टम खोखले दावे कर रहा है। कोरोना संक्रमण से बंथरा की 45 वर्षीय लली की मौत ने भी यही तस्दीक किया। तबीयत खराब होने पर पर उन्हें पहले बंथरा के ही एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पति रामसेवक ने बताया कि लली की हालत लगातार बिगड़ रही थी। मंगलवार को उन्हें बरेली हायर सेंटर रेफर किया गया। वे लोग सुबह सात बजे एक मेडिकल कॉलेज पहुंचे। यहां बेड और ऑक्सीजन न होने की बात कहकर उन्हें भर्ती नहीं किया गया।
इसके बाद वे उन्हें लेकर जिला अस्पताल पहुंचे लेकिन यहां इमरजेंसी में भी व्यवस्थाएं न होने की बात कहकर भर्ती करने से इनकार कर दिया गया। करीब दस बजे रामसेवक पत्नी को लेकर तीन सौ बेड अस्पताल पहुंचे। यहां भी कोई बेड उपलब्ध नहीं था। बरामदे में ही बेंच पर लिटाकर उन्हें ऑक्सीजन लगा दी गई लेकिन इस समय तक उनका ऑक्सीजन स्तर दस से भी कम हो चुका था। कुछ देर बाद उन्होंने दम तोड़ दिया।
नहीं मिली एंबुलेंस, कई घंटे तक
मरीजों के बीच रखा रहा शव
लली का जीवन बचाने की उनके परिवार वालों की तमाम कोशिशें तो नाकाम रही हीं, उनकी मृत्यु के बाद उनका शव ले जाने के लिए उन्हें घंटों जूझना पड़ा। काफी कोशिश करने के बावजूद कई घंटों तक एंबुलेंस का इंतजाम नहीं हो पाया। इस बीच लली का शव तीन सौ बेड अस्पताल परिसर में ही रखा रहा जहां आसपास कई मरीजों को जमीन पर लिटाकर ऑक्सीजन दी जा रही थी। एंबुलेंस के लिए गिड़गिड़ाते हुए उनके पति और बेटे का रो-रोकर बुरा हाल था। बमुश्किल दोपहर एक बजे एंबुलेंस मिल पाई जिसके बाद वे लली का शव लेकर बंथरा रवाना हुए।