लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती, बस एक मां है जो मुझसे खफा नहीं होती। मशहूर कवि मुन्नवर राना की ये लाइनें इस बार गौरादेवी अग्रवाल को समर्पित हैं। एक कारोबारी की पत्नी, तीन बेटे और छह बेटियों की मां वृद्धाश्रम में जिंदगी के आखिरी दिन गिन रही है। बहुत तकलीफ में हैं। बच्चों से शिकायत तो है लेकिन उनके लिए कुछ भी बुरा नहीं कहना चाहती। इस कहानी में बांगवां फिल्म का शेड भरा है उनके एक पड़ोसी ने जो अब उन्हें अपने बच्चों से प्यारा है और जब भी उन्हें कुछ चाहिए उसे फोन करवा देती हैं।
श्राद्ध पक्ष में लोग उन पितरों का तर्पण करते हुए भावुक होते हैं जो अब उनकी दुनिया में नहीं हैं लेकिन यहां एक जीवित मां बच्चों के मन में श्रद्धा के जगने का इंतजार कर रही है। शहर के मशहूर बेसन कारोबारियों के पास सब कुछ है, केवल मां के लिए घर का एक कोना नहीं। इस पर भी मां उन बच्चाें से खफा नहीं। वृद्धा आश्रम में गौरादेवी अग्रवाल आज अपनी पसंद के व्यंजन खाने को तरसती हैं। हाल ही में जब वृद्धा आश्रम में जेसीज मैगनेट सिटी के लोग पहुंचे तो उन्होंने पसंद का भोजन कराने की ख्वाहिश जता ही दी। अरुण अग्रवाल, अंबरीश अग्रवाल और महेश अग्रवाल उनके तीन बेटे हैं, इनके अलावा छह बेटियां भी हैं। सब सम्पन्न हैं लेकिन उनका हाल पूछने वाला कोई नहीं। जब से अंबरीश का बेटा हुआ है, तब से वह जरूर यदा कदा मां से मिलने आश्रम पहुंच जाते हैं। गौरादेवी कहती हैं कि शायद डर है कि उनके साथ भी ऐसा न हो जैसा उनके साथ हुआ। बाकी कोई नहीं आता।
गौरा देवी के पति रामेश्वर प्रसाद आलमगिरीगंज में बेसन कारोबारी थे। उनकी मौत के बाद पत्नी गौरादेवी अग्रवाल का घर में रहना मुश्किल हो गया। गौरादेवी अपनी कहानी सुनाती हैं और आंख से आंसू भी पाेंछती जाती हैं। कारोबार को लेकर बेटों में मनमुटाव हुआ। घर में कलह देख पहले बड़े बेटे ने दिल्ली उनके पोते के पास भेजा था लेकिन यहां ज्यादा दिन नहीं रह पायीं। जब छोेटे बेटाें के मन में भी जगह कम हो गई तो खुद आश्रम आ गई।
पड़ोसी को मानती हैं अपना
गौरा देवी बताती हैं कि पड़ोस में रहने वाले दीपक ही उनका सहारा हैं। अधीक्षिका कांता गंगवार कहती हैं कि जब गौरादेवी को कुछ खाने, पैसे या इलाज की जरूरत होती है तो वे सीधे दीपक को ही फोन मिलवाती हैं। पिछले चार सालाें में परिवार से किसी ने पैसा भी नहीं भेजा।