'मुस्लिम औरतें शरीयत पर ही अमल करेंगी'
राष्ट्रीय सुन्नी उलमा कौंसिल के अध्यक्ष मौलाना इंतजार अहमद कादरी ने कहा कि तीन तलाक कानून इस्लामी शरीयत पर खुला हमला है। एक समझीबूझी प्लानिंग के तहत तीन तलाक के जरिये इस्लामी शरीयत में हस्तक्षेप किया जा रहा है। मुस्लिम महिलाओं से हमदर्दी की आड़ में तीन तलाक पर बिल पास कराना भारतीय संविधान के खिलाफ है। 30 लाख से भी ज्यादा गैर मुस्लिम महिलाएं बगैर तलाक के अपने पतियों से दूर रहने को मजबूर हैं, क्या उनकी हिमायत में कभी कोई बिल लाया गया। ऐसी महिलाओं से बेखबर लोग मुस्लिम महिलाओं से इतनी हमदर्दी क्यों जता रहे हैं।
उन्होंने कहा कि अगर हुकूमत की नीयत साफ है तो मुस्लिम महिलाओं की तालीम और रोजगार पर तवज्जो क्यों नहीं दी जाती। मॉब लिंचिंग की घटनाएं मुस्लिम पुरुषों से महिलाओं तक पहुंच गईं हैं। क्या उसके खिलाफ भी कोई कदम उठाया गया। तीन तलाक पर बेशक बिल पास हो गया, मगर अधिकतर महिलाएं शरीयत पर ही अमल करती हैं और हमेशा करेंगी।
'सियासी फैसला मगर कुछ फायदा भी होगा'
तंजीम उलमा इस्लाम के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना शहाबुद्दीन रजवी का कहना है कि तीन तलाक पर बिल पास होना ही था क्योंकि केंद्र सरकार मुस्लिम महिलाओं के साथ हमदर्दी जताकर मुस्लिम समाज के कुछ वोट हासिल करना चाहती है जिसमें उसे कामयाबी मिल गई। इस बिल से बेशक नुकसान होंगे, मगर कुछ फायदे भी हो सकते हैं क्योंकि हर बुराई में भी कुछ अच्छाई का पहलू छिपा ही होता है। तीन तलाक एक साथ देना समाज के अंदर की बुराई थी। उलमा और मस्जिदों के इमाम बराबर आगाह करते रहे मगर समाज का एक बहुत बड़ा तबका इस पर अमल करता नजर नहीं आया। इसी की सजा पूरी कौम को मिली है। इस तरह अब देश में दो तरह के कानून का लोग पालन करेंगे। एक वह जो कुरान और हदीस के मुताबिक है और दूसरा वह जो संसद में पास किया गया। ऐसी सूरत में मुस्लिम समाज में बड़े पैमाने पर टकराव की सूरत पैदा होगी। बहरहाल हम संसद में पारित कानून का स्वागत करते हैं।