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खबरें मिलने के बाद भी ‘बेखबर’ बने रहे नेपाल सीमा के पहरेदार

Mon, 14 Oct 2019 03:32 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, लखीमपुर खीरी
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Terror Funding, demo
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भारत-नेपाल सीमा पर टेरर फंडिंग के इनपुट सीमा की निगरानी में लगीं सुरक्षा एजेंसियों को लगातार स्थानीय लोगों से मिले थे, मगर सुरक्षा एजेंसियों ने इसे सामान्य प्रक्रिया बताकर पल्ला झाड़ लिया था।

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इस काम में लगे लोग मुखबिर की तरह पुलिस और इन सुरक्षा एजेंसियों को दूसरे लोगों द्वारा की जा रही तस्करी की छोटी-छोटी जानकारियां देकर उन्हें पकड़वाकर अपने ऊपर हाथ रखवाए रहते थे।

लोगों का कहना है कि सुरक्षा एजेंसियां यदि इनपुट पर गौर कर तहकीकात करतीं तो शायद देश विरोधी ताकतों की जड़ें तराई में नहीं जम पातीं या कम से कम पहले ही खुलासा हो जाता। नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में देश विरोधी ताकतों के बारे में पता लगाने के लिए ‘सीमा जागरण मंच’ सीमावर्ती गांवों में जन जागरूकता अभियान चलाता है।
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साथ ही गांवों में बैठक कर सीमा पर होने वाली गतिविधियों की जानकारी भी जुटाता है। अमर उजाला ने इस संगठन के जिला संयोजक विनय जायसवाल, जिला युवा प्रमुख डॉ. सुनील सत्यार्थ और खंड उपाध्यक्ष रमाशंकर पांडेय से बातचीत की। तीनों पदाधिकारियों का कहना था कि टेरर फंडिंग के मामले में गिरफ्तार अभियुक्त स्थानीय पुलिस और सीमा से जुड़ी अन्य सुरक्षा एजेंसियों के संपर्क में थे।

वे सुरक्षा एजेंसियों को छोटी-मोटी तस्करी की सूचनाएं देकर उन्हें पकड़वाते थे। बाद में स्वंय उसका निपटारा करवा देते थे। इन्हीं संबंधों का लाभ उठाकर देश विरोधी कृत्यों को अंजाम देते थे। एजेंसियां जब तक ऊपर से दबाव न पड़े तब तक इन कार्यों के प्रति अनजान रहती हैं। कोई आवाज उठाता है तो उसे संबंधित को बता देते हैं या फिर उसकी आवाज को दबा देते हैं।

तीनों पदाधिकारियों ने बताया कि टेरर फंडिंग की करीब तीन महीने पहले सीमा जागरण मंच को बैठकों के दौरान जानकारी हुई थी। उन्होंने इसकी जानकारी स्थानीय एसएसबी की खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों को खुद दी थी। उस समय अफसरों ने यह कहकर अनसुना कर दिया था कि दोनों देशों के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग बाजार आते-जाते ही हैं।

व्यापारिक दृष्टिकोण से  थोड़े-बहुत रुपये एक्सचेंज करते हैं। इसमें कोई ऐसा अपराध नहीं है। टेरर फंडिग गिरोह के लोग इसी व्यापार की आड़ में बड़े पैमाने पर देशी विरोधी इस कृत्य को अंजाम देते रहे और उनकी सीमावर्ती क्षेत्रों में जड़े जमती चली गईं।

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एटीएस नेपाल में बैठे आतंकियों के मददगारों की तलाश में जुटा

टेरर फंडिंग मामले की विवेचना कर रहा एटीएस (एंटी टेररिज्म स्क्वॉड) अब नेपाल में बैठे आतंकियों के मददगारों की तलाश में जुट गया है। एटीएस का पहला मकसद नेपाल में बैठे उन लोगों का पता लगाना है जो दूसरे देशों से नेपाल के बैंक में रुपये मंगाते थे।

रविवार को यहां पहुंचने के बाद एटीएस की टीम ने विवेचना के प्रारंभिक तथ्यों को जुटाने के लिए पलिया बस अड्डे के निकट उस स्थान का भी निरीक्षण किया, जहां से चारों आरोपियों को गिरफ्तार बताया गया था। 

नेपाल को अड्डा बनाकर आतंकियों को रकम पहुंचाने वाले गिरोह का शुक्रवार को पर्दाफाश बरेली के इज्जतनगर थाना क्षेत्र के गांव परतापुर चौधरी निवासी उम्मेद अली, समीर सलमानी और तिकुनियां (लखीमपुर खीरी) निवासी संजय अग्रवाल व बदालपुरवा (तिकुनियां) के एराज अली को गिरफ्तार किया था। इसमें एटीएस का भी सहयोग था। 

टेरर फंडिंग के इस मामले की रिपोर्ट थाना निघासन में दर्ज होने के बाद मामले की विवेचना डीजीपी ने यूपी एटीएस को सौंप दी थी। यूपी एटीएस की सात सदस्यीय टीम सीओ शैलेंद्र सिंह के नेतृत्व में रविवार सुबह करीब 11.30 बजे लखीमपुर खीरी जिला मुख्यालय पहुंची।

करीब आधे घंटे रुकने के बाद टीम निघासन रवाना हो गई। टीम ने निघासन के सीओ राकेश कुमार नायक और प्रभारी निरीक्षक के साथ करीब दो घंटे तक थाना पर बैठक की। सूत्रों के मुताबिक बैठक में नेपाल में बैठे आतंकियों के मददगारों की गिरफ्तारी के लिए रणनीति बनाई गई। 

इसके बाद विवेचना के प्रारंभिक तथ्यों को जुटाने के लिए पलिया पहुंची टीम ने वहां बस अड्डे के मैनेजर राजकुमार, व्यापारी बबलू, हसीब हसीब, लक्ष्मण भगत सहित छह लोगों के बयान दर्ज किए। सीओ निघासन ने गिरफ्तारी स्थल का नक्शा आदि बनाकर एक फाइल एसटीएस को सौंपी।
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