बसपा में जो नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा वह ओके हो गया। किसे टिकट दिलाना है, किसे पार्टी में रखना है किसे मायावती तक पहुंचाना है किसे पद दिलाना है..जो तय करते थे नसीमुद्दीन ही करते थे। नसीमुद्दीन के बल पर ही मायावती ने 2012 और 2017 के विधान सभा चुनावों में दलित और मुस्लिम का कार्ड खेला। टिकट बंटवारे की छूट के साथ ही उन पर जिम्मेदारी थी कि मुस्लिम समाज के रसूखदार लोगों को जोड़े। बसपा सुप्रीमो के मोहभंग के पीछे चुनावी पैसे और खास कर सदस्यता बुक का हिसाब न दिया जाना और मुस्लिम समाज को बसपा से न जोड़ पाना ही मुख्य वजहें हैं। जिन मंडलों का हिसाब पार्टी को नहीं मिला है वे नसीमुद्दीन के पास थे इनमें बरेली भी शामिल है। नसीमुद्दीन ने जो आडियो जारी किए हैं उनमें भी इस बात का उल्लेख आ रहा है। यह भी संभव है कि पार्टी उनसे जुड़े कुछ और लोगों पर आगे कार्रवाई करे। अभी यह साफ नहीं हुआ है कि नौ मई की बैठक में कौन-कौन कोआर्डिनेटर अपना सही हिसाब बता पाया। इन्हें सीधे बहन जी के सामने हिसाब बताना था।
पार्टी वाले भी मान रहे हैं कि नसीमुद्दीन का अहम इतना बढ़ गया था कि उन्होंने पार्टी हित की बजाए अपनी पसंद को थोपा। चुनाव से पहले वह बरेली में लगातार कैंप करते रहे लेकिन दरगाह आला हजरत के लोगों से नजदीकी नहीं बना पाए। शहजिल इस्लाम को बसपा में शामिल नहीं करा सके तो केसर सिंह गंगवार को पार्टी छोड़ने से रोक नहीं पाए। 2012 के चुनाव में आंवला के तत्कालीन विधायक आरके शर्मा, भोजीपुरा के विधायक रहे शहजिल इस्लाम, बीसलपुर अनीस खां उर्फ फूल बाबू और उसहैत के विधायक रहे मुस्लिम खां का टिकट नसीमुद्दीन के इशारे पर ही काटे गए थे। यह सभी नसीमुद्दीन को ही पार्टी से अलग होने का सबसे बड़ा कारण बताते हैं। शाहजहांपुर के रोशनलाल वर्मा को भाजपा के संपर्क में आने का आरोप लगाते हुए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और वही भाजपा के टिकट पर विधायक भी बन गए। मनमानी का ही असर हुआ कि बरेली मंडल में बसपा साफ हो गई। ज्यादातर स्थानों पर प्रत्याशी जमानत तक नहीं बचा सके। जहां पार्टी का कैडर ठीक था वहीं कुछ बेहतर स्थिति रही जहां नसीमुद्दीन ने अपनी पसंद के प्रत्याशी उतारे वहां हाल बुरा हुआ। बरेली शहर और कैंट समेत कई सीटों पर तो गलत चयन की वजह से कैडर वोट भी हाथ से निकल गया, जबकि प्रत्याशी पैसे के हिसाब से बहुत दमदार थे।
नसीमुद्दीन बसपा के मिशन पर नहीं अपने मिशन पर काम कर रहे थे। अब असलियत सामने आ गई है। उन्होंने अपने कार्यकाल में पार्टी का बहुत नुकसान किया। योग्य पदाधिकारियों को किनारे लगाया। पार्टी पर कब्जा करना चाहते थे-घनश्याम चंद्र खरवार, पूर्वांचल प्रभारी, बसपा
हम और कार्यकर्ता बहन जी के साथ हैं। जिसने जो किया है उसकी सजा उसे मिल गई है। पार्टी में किसी तरह का कोई विघटन या टूटफूट जैसी स्थिति नहीं आने वाली है। अब लोग और मजबूती से काम करेंगे- अतर सिंह राव, एमएलसी, कोआर्डिनेटर बरेली मंडल
बहन जी ने सही समय पर फैसला किया है। तमाम लोगों ने सिद्दीकी साहब की शिकायतें की थीं। उसके आधार पर ही कार्रवाई की गई है। उनके निकाले जाने से पार्टी को कोई नुकसान नहीं होने वाला है- सुनील चित्तौड़, एमएलसी, कोआर्डिनेटर आगरा, अलीगढ़
और किनारे होने लगे
कैंट सीट से चुनाव लड़कर अपनी जमानत तक न बचा पाने वाले राजेंद्र गुप्ता ने अपने कार्यालय से बसपा के सारे निशान मिटा दिए हैं। कुछ लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जल्द ही कोई फैसला ले सकते हैं।
अब्बास पर गिरी गाज
बरेली। बसपा से निकाले गए नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ खड़ा होने वाले अली अब्बास जैदी को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अब्बास बरेली मंडल में मुस्लिम समाज प्रभारी थे और अफजाल सिद्दीकी के साथ चुनाव प्रचार में लगाए गए थे। जिलाध्यक्ष नरेेंद्र सागर ने इसकी भनक लगते ही अब्बास को अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी के आरोप में निकाल दिया है। बरेली में यह पहली कार्रवाई है। बताया जाता है कि सिद्दीकी से आंतरिक संबंध रखने वालों को चिह्नित किया जा रहा है।