रविवार को दुनिया से रुखसत हुए शास्त्रीय संगीत जगत के सितारे पद्म विभूषण उस्ताद गुलाम मुस्तफा खां का बरेली से खास रिश्ता था। एक तरफ जहां उनका खानकाह नियाजिया से रुहानी रिश्ता रहा, वहीं बरेली की पतंग उनकी पसंद थी।
हर दिल अजीज उस्ताद गुलाम मुस्तफा बदायूं के सहसवान के रहने वाले थे। संगीत प्रोफेशन की वजह वो काफी अरसे से मुंबई जा कर बस गए थे। वह पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। मुंबई स्थित अपने निवास पर रविवार दोपहर उन्होंने आखिरी सांस ली। सहसवान संगीत घराने के फनकार उस्ताद का बरेली से गहरा रिश्ता रहा है।
वह जब भी दिल्ली आते या अपने घर बदायूं आते तब बरेली जरूर आकर रुकते थे। यहां आते तो वह खानकाह नियाजिया भी जाते थे। उन्होंने कई बार सरकार हजरत हसनी मियां के वक्त में संगीतमयी हाजिरी भी पेश की। वह हमपेशा और नाइटिंगेल्स मैलोडी क्लब के निर्देशक व संगीतकार राज मलिक से मिलने जरूर जाते थे। उस्ताद उनसे उनसियत रखते थे। इसके अलावा उस्ताद गुलाम मुस्तफा को बरेली की पतंगें बहुत पसंद थीं। वह यहां के सराय खाम की एक खास दुकान से अक्सर पतंगें खरीदकर ले जाते थे।
उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीत भी दिया था। खास तौर से उमराव जान में खय्यम के साथ एक गाने में अपनी आवाज भी दी। गुलाम मुस्तफा के तीन बेटे हैं, इनमें से मुर्तुजा और कादिर फिल्मों में गानों को अपनी आवाज देते हैं। एक फिल्म में उनके बेटों की गाई कव्वाली ‘हाजी अली, पिया हाजी अली...’ बहुत मशहूर हुई थी।
खानकाह नियाजिया के प्रबंधक शब्बू मियां नियाजी ने बताया कि उस्ताद गुलाम मुस्तफा खानकाह से रुहानी ताल्लुक था। वह अक्सर यहां हाजिरी देने आते थे। पिछले हफ्ते जब वह (शब्बू मियां) अपने मजहबी दौरे पर मुंबई गए तो उस्ताद के बीमार होने का पता चला। तब वह बांद्रा स्थित उनके निवास पर उन्हें देखने भी गए थे। बोले- उम्मीद नहीं थी उस्ताद इतनी जल्दी इस दुनिया से चले जाएंगे। उनके इंतकाल पर खानकाह में उनकी मगफिरत के लिए दुआ की गई।
नाइटिंगेल्स मैलोडी क्लब के निर्देशक राज मलिक ने भी उस्ताद गुलाम मुस्तफा के इंतकाल पर दिली अफसोस जाहिर किया। उन्होंने बताया कि उस्ताद उन्हें बेहद मोहब्बत करते थे और उनके काम से खुश रहते थे। दशकों से उनके घर आने का सिलसिला बना हुआ था। जब राज मलिक की अम्मी जिंदा थी तो उस्ताद उनसे खाना बनवाकर जरूर खाते थे। जब वालिदा बीमार पड़ीं और अस्पताल में भर्ती थीं तो भी देखने आए थे।
पतंग व्यवसायी मोहम्मद इनाम ने बताया कि उस्ताद उनसे बहुत मोहब्बत करते थे। अक्सर बरेली आने पर वह मिलने आते थे या हम खुद उनसे मिलने पहुंच जाते थे। उनसे घरेलू ताल्लुकात थे। उन्हें बरेली की पतंग से बहुत लगाव था। अक्सर उनके यहां से पतंग ले जाया करते थे। उनसे बहुत कुछ सीखने का मौका भी मिला। दरअसल वह रुहानियत के बहुत करीब थे और आम लोगों से भी वह अध्यात्म की बातें करते थे।