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Bareilly News: मां मजबूत भी... ममता भी और मातृशक्ति की मिसाल भी

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बरेली। हर मां की गोद में एक दुनिया बसती है। वो सिर्फ जीवन नहीं देती, वो सपनों को भी सींचती हैं। इस मदर्स डे पर हम आपको ऐसी मातृशक्ति के बारे में बता रहे हैं, जिन्होंने जिदंगी के सबसे मुश्किल मोड़ पर भी हार नहीं मानी। इनकी हिम्मत और ममता ने न सिर्फ अपने बच्चों को बुलंदियों तक पहुंचाया, बल्कि समाज को भी एक मिसाल दी कि मां सिर्फ एक शब्द नहीं, एक संपूर्ण सृष्टि है। संवाद
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पति के जाने के बाद खुद संभाली जिम्मेदारी
मेरी जिदंगी एक खुशहाल परिवार से शुरू हुई थी। पति के साथ जीवन सुखद चल रहा था। मेरे दो बेटे हैं, पर साल 2015 में एक एक्सीडेंट ने मेरे जीवन को झकझोर दिया। पति की मौत ने सब कुछ बदल दिया। उस वक्त बच्चे छोटे थे और भविष्य अनिश्चित था, लेकिन खुद को टूटने नहीं दिया। पहले बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक बनीं, बरेली के सेंट फ्रांसिस स्कूल में पढ़ाने लगीं। फिर 2017 में पोस्ट ऑफिस में नौकरी मिल गई। घर की हर ज़िम्मेदारी खुद संभाली। आज मेरा छोटा बेटा रूस में एमबीबीएस कर रहा है और बड़ा बेटा बंगलूरू में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। - दिपाली गुप्ता, वीर सावरकर नगर

हर कदम पर दोस्त बनकर बच्चों के साथ रही
मैं डीके इंटर कॉलेज में लेक्चरर हूं। वर्ष 1991 में शादी हुई और जिदंगी सामान्य गति से चल रही थी, लेकिन कहते हैं कि खुशियों को किसी की नजर भी लग जाती है, 2013 में पति की मौत ने अकेला कर दिया। उस समय बेटी महज 15 साल की थी और बेटा कोटा में पढ़ाई कर रहा था। बेटे ने सिविल इंजीनियरिंग चुनी और बेटी का सपना डॉक्टर बनने का था। अपने सारे संसाधन बच्चों की पढ़ाई में लगा दिए। हर कदम पर मां बनकर, शिक्षक बनकर और दोस्त बनकर बच्चों के साथ खड़ी रहीं। आज बेटा एक सफल इंजीनियर है और बेटी डॉक्टर। मेरे बच्चों की मुस्कान में मुझे अपने पति का साथ महसूस होता है। - मीनू अग्रवाल, गांधी नगर
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हर मुश्किल में एक दीवार बनकर खड़ी रही
वर्ष 2015 में मेरे जीवन में अंधेरा छा गया, जब कैंसर से पति की मौत हो गई। उस समय बड़ी बेटी 19 साल की और छोटी 14 साल की थी। मैं एक व्यवसायिक शिक्षक थीं, लेकिन अब मुझे मां के साथ-साथ पिता की भूमिका भी निभानी थी। दो बेटियों की अकेले परवरिश करना कितना कठिन होता है। फिर भी हार नहीं मानी और लग गई अपनी बेटियों के सपने को पूरा करने में। बेटियों को न सिर्फ पढ़ाया, बल्कि आत्मनिर्भर भी बनाया। फिलहाल दोनों बेटियां अपने सपने को पूरा कर चुकी हैं। एक बेटी इवेंट मैनेजमेंट में अपना करियर बना रही है और बड़ी बेटी अमेरिकन एक्सप्रेस जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनी में काम कर रही है। - अंजू साहनी, डीडीपुरम चौराहे के पास



पति की मौत के बाद नहीं टूटी हिम्मत
बरेली। पूनम सिंह वधावन की 16 वर्ष की उम्र में 10 दिसंबर 1991 को शादी हुई थी। वर्ष 2009 में पति का आकस्मिक निधन हो गया। उस समय उनके सात छोटे-छोटे बच्चे थे। जिनमें सबसे छोटा बेटा सिर्फ एक साल का था। पति की मौत के बाद तीन साल तक हालात बेहद कठिन रहे। कई लोगों ने सलाह दी कि वह घर बेचकर किसी रिश्तेदार के पास चली जाएं, लेकिन पूनम ने ठान लिया था कि वह यहीं रहकर अपने पति के अधूरे सपनों को पूरा करेंगी। बच्चों की पढ़ाई पर उन्होंने पूरा ध्यान दिया। जब तक बेटे पढ़ रहे थे, पूनम ने खुद बिजनेस संभाला। आज उनके सभी बेटे अपने-अपने बिजनेस में हैं, दो बेटियों की शादी हो चुकी है। पूनम कहती हैं, बच्चे ही मेरी ताकत बने और मैं उनके लिए मजबूत बनी रही।
ओलंपिक तक के सफर में मां बनीं प्रियंका की ताकत
पेरिस ओलंपिक, टोक्यो ओलंपिक में प्रतिभाग कर चुकी रेस वॉकर प्रियंका गोस्वामी ने मां अनीता को अपनी सफलता का सबसे बड़ा स्तंभ बताया। प्रियंका का कहना है कि मां ने हमेशा हर परिस्थिति में साथ दिया और कभी हार न मानने की प्रेरणा दी। इज्जतनगर निवासी प्रियंका पूर्वोत्तर रेलवे में स्पोर्ट्स ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि बचपन में वह जिम्नास्टिक्स के खेल में थीं, लेकिन वर्ष 2011 में एथलेटिक्स की ओर रुख किया। मां ने उनके फैसले का पूरा समर्थन किया और हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया। मां की मेहनत, ममता और प्रेरणा ही ओलंपिक जैसे बड़े मंच तक पहुंचने की असली वजह बनी। उन्होंने कहा कि अगर वह उनका साथ नहीं देतीं, तो शायद वह कभी खेल में इतना आगे नहीं बढ़ पातीं।
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