बरेली। नकटिया नदी के पानी में पारे की मौजूदगी मिली है। लोहे की मात्रा भी खतरनाक स्तर को पार कर गई है। रुहेलखंड विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के डॉ. ललित कुमार पांडेय, एमएससी की छात्रा रिया शर्मा व अन्य विद्यार्थियों के अध्ययन में इसका पता चला है। यह अध्ययन एससीआईई (आईएफ-2.7) जर्नल के प्रोटोप्लाज्मा पेपर में प्रकाशित हो चुका है।
डॉ. ललित ने बताया कि बिथरी चैनपुर, डोहरा रोड, हरूनगला क्षेत्र से नदी के पानी के नमूने लेकर दो वर्षों तक अध्ययन किया गया। पानी में लोहे की सामान्य मात्रा 0.3 मिलीग्राम प्रति लीटर तक होनी चाहिए। अध्ययन में यह दो मिलीग्राम प्रति लीटर तक मिला। पारे की मात्रा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से कम होनी चाहिए। अध्ययन में यह 20 माइक्रोग्राम प्रति लीटर मिला। कई स्रोतों से पानी बिना ट्रीटमेंट के सीधे नदी में गिर रहा है। इससे पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ रहा प्रभाव
जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण आधार सूक्ष्म, एक कोशिकीय प्रकाश संश्लेषक शैवालों के लिए भी यह घातक है। ये सूक्ष्म शैवाल पानी में ऑक्सीजन बनाने और खाद्य शृंखला बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। शोधकर्ताओं ने इनके आकार, गतिशीलता और आंतरिक संरचना में गंभीर बदलाव दर्ज किए हैं। अध्ययन में पाया गया कि लोहे और पारे के मिश्रण ने शैवालों को कई गुना ज्यादा नुकसान पहुंचाया। उच्च सांद्रता के संपर्क में आने पर शैवाल के बाहरी आवरण का आकार विकृत हो गया। उसकी गतिशीलता में भी गिरावट आई। उनकी आंतरिक कोशिकाओं में असामान्य बदलाव देखे गए।
गैर-वर्गीकरण मापदंड का किया इस्तेमाल
इस शोध में गैर-वर्गीकरण मापदंडों का उपयोग किया गया। डॉ. ललित ने बताया कि यह सूक्ष्म प्रजातियों की अलग-अलग पहचान करने की जटिलता को कम करता है। यह तकनीक पानी में धातुओं के त्वरित और दीर्घकालिक प्रभावों को पकड़ सकती है। अध्ययन स्पष्ट करता है कि जल निकायों की सुरक्षा के लिए केवल एकल धातुओं के मानकों को तय करना काफी नहीं है। जब तक हम रासायनिक मिश्रणों के असर को नहीं मापेंगे, तब तक जलीय जीवन और अंततः हमारी खाद्य शृंखला पर मंडरा रहे खतरे का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।