इंडिपेंडेंट स्कूल एसोसिएशन ने शुक्रवार को वार्षिक बैठक बुलाकर नए सेशन के लिए रूपरेखा तैयार कर ली। एसोसिएशन ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर एकरूप निर्णय का दावा किया है। जिन विद्यार्थियों के शैक्षिक भविष्य का बैठक में फैसला लिया गया, उनके अभिभावकों को नहीं बुलाया गया। एसोसिएशन से जुड़े 35 पब्लिक स्कूलों ने ही विद्यार्थियों के हितों पर फैसला कर लिया। अभिभावक संघ का कहना है कि उनके सुझावों और सहमति के बिना स्कूल नर्सरी के लिए बच्चे की उम्र के निर्धारण या स्टेशनरी की खरीद जैसे मुद्दों पर आखिर कैसे फैसला ले सकते हैं। इंडिपेंडेट स्कूल एसोसिएशन के निर्णयों पर अभिभावक संघ ने यह दी राय-
स्कूल की फीस
बैठक में निर्णय लिया गया है कि शैक्षिक सत्र 2018-19 के लिए सभी स्कूल अधिकतम 10 फीसदी ही फीस बढ़ा सकते हैं। इसका स्कूल अपने यहां बैठक करके फैसला लें। उधर, अभिभावक संघ के प्रदेश अध्यक्ष अंकुर किशोर सक्सेना का कहना है कि सभी स्कूलों में अभिभावक संघ है, स्कूल उनके साथ बैठक करके पिछले साल की समीक्षा करें। जरूरत के हिसाब से ही फीस बढ़ोत्तरी पर फैसला हो और सिर्फ ट्यूशन फीस में ही अधिकतम 10 प्रतिशत तक की वृद्धि की जाए।
कक्षा के साथ बढ़ता खर्च पड़ता है भारी
ज्यादातर स्कूल प्री नर्सरी से लेकर केजी तक, कक्षा एक से चार तक, पांच से नौ तक और इसी तरह कक्षाओं को ग्रुप में बांटकर फीस का ढांचा तैयार करते हैं। इन ग्रुपों की फीस का अंतर पहले से ही 20 से 25 फीसदी होता है। ऐसे में नए सत्र में जब स्कूल की फीस बढ़ाई जाती है तो जिन बच्चों का ग्रुप बदल रहा होता है, उनकी फीस में 40 से 50 फीसदी तक वृद्धि हो जाती है। जेब पर एक साथ इतना भार पड़ने के कारण कई बार अभिभावक को बच्चे को उस स्कूल से निकालना भी पड़ता है। अभिभावक संघ का कहना है कि इस तरह की वृद्धि को नियंत्रित किया जाए। इतनी ही बढ़ोतरी हो जिसे अभिभावक वहन कर सकें। अभिभावकों का यह भी कहना है कि इस तरह की स्थिति में स्कूल बदलने से बच्चे की मनोदशा पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसके अलावा कक्षा 11 में बोर्ड का फार्म भरने के लिए विद्यार्थियों से 1000 से 1500 रुपये तक लिए जाते हैं। यह फीस चोरी छिपे ली जाती है। इसकी रसीद नहीं मिलती। इसे बंद किया जाना चाहिए।