जिनकी जिंदगी में खुशियां भरने, उनके भविष्य को रोशन करने के लिए खुद को श्रम की भट्ठी में तिल-तिल जला दिया आज उन्हीं ने मुंह मोड़ लिया है। दिवाली पर घर-परिवार से उपेक्षित इन बुजुर्गों से बात की तो कइयों की आंखें झलक आईं। ममता आश्रय गृह और काशीधाम वृद्धाश्रम में पनाह लिए यह बुजुर्ग के बुजुर्ग हर त्योहार पर ही उदास होते हैं। बोले, अब क्या दिवाली और क्या होली। पुरानी जिंदगी याद आती है, तो तकलीफ होती है। संस्थाएं और समाजसेवी आकर फल, मिठाई और कपड़े दे जाते हैं। यह सब हमारे मतलब का नहीं हैं। हमें भी अपने परिवार का प्यार और साथ चाहिए। हम चाहते हैं कि हमारे अपने यहां से हमें ले जाएं। आश्रय गृह में डॉ. विकास वर्मा ने बुजुर्गों को फल बांटे। ग्रीन पार्क के राकेश अग्रवाल पत्नी रश्मि अग्रवाल के साथ वृद्धाश्रम में अपनी मौसी मायारानी का 90 वां जन्मदिन मनाने पहुंचे। दोनों ने मौसी को केक खिलाया। कंधे पर हाथ रखते ही मौसी बहू से लिपट कर रुआंसी हो गईं। मुंह से शब्द ही नहीं निकले।
हम झालर लगाते थे, दीये जलाते थे
बीसलपुर रोड स्थित ममता आश्रय गृह में रह रहीं महिलाएं कहने को मानसिक मंदित हैं कुछ सही हो गई हैं, उन्हें बहुत कुछ पहले का याद भी है। फतेहगंज पूर्वी की पूजा अच्छी बात करती हैं, कहती हैं पापा मिठाई लाते थे, हम लोग दीये और झालर जलाते थे। अब हम यहां से जाना चाहते हैं, लेकिन कोई लेने नहीं आता, मैडम भेजेंगी तब जाएंगे।
तब हम नए कपड़े पहनते थे
ममता आश्रय गृह में एक ओर पूजा हैं, वह भी ठीक से बात कर लेती हैं। बताने लगीं दिवाली पर हम लोग पूजा करते थे। नए कपड़े भी पहनते थे। घर सजाते थे, लेकिन अब हमसे कोई मिलने नहीं आता है। यह पूछने पर कि इस बार दिवाली के लिए क्या किया है, बोलीं, हमने साफ-सफाई की है।
मैं तो अच्छा सा खाना बनाती थी
आश्रय गृह में रह रही हरबाई छत्रपुर की है। दिवाली कैसे मनाती थीं, के सवाल पर बोलीं, मैं अच्छा खाना बनाती थी। पूड़ी आलू की सब्जी बनाती थी। घर में झालर लगाती थी। यहां भी हम लोग दिवाली मनाते हैं, लेकिन हमारा यहां कोई नहीं है।
हमें याद है पहले की दिवाली
दिल्ली से आईं उमा बताने लगीं कि हम अपने घर की पुताई कराते थे। परिवार के सभी लोग साथ में पूजा करते थे। मोमबत्तियां जलाते थे। यहां हम अकेले हैं। हमें पहले की बहुत याद आती है, लेकिन कोई आता ही नहीं है।
याद आई परिवार के साथ मनाई दिवाली
गांधीपुरम हार्टमैन स्कूल के पास स्थित काशीधाम वृद्धाश्रम में रह रहे अनिल अरोरा, उनकी किरन अरोरा, ओमप्रकाश, केतकी देवी, लीलाधर, अशोक कुमार, अनंजय सक्सेना आदि बुजुर्ग ऐसे हैं जिन्होंने अपनों के बीच न जाने कितने त्योहार मनाए हैं। बच्चों को खुशियां बांटी हैं लेकिन आज कतरा-कतरा खुशी के लिए तरस रहे हैं। पहले के त्योहारों की सारी खुशियां अब यादें बनकर रह गई हैं। अपनों के बीच से निकलकर अब यहां गैरों के बीच परिवार की तरह रह रहे हैं। उन्हीं के साथ त्योहार मनाते हैं। दिल में यह टीस रहती है कि काश.. कोई अपना खुशी में साथ होता। यहां कुछेक समाजसेवी आकर वस्त्र, फल, मिठाई दे जाते हैं।
मायारानी ने मनाया 90 वें जन्मदिन
मायारानी ने बुधवार को वृद्ध आश्रम में अपना 90 वां जन्मदिन मनाया। उनकी बहन का बेटा और बहू केक लाए। काम तो अच्छा करने आए थे । बहू रश्मि अग्रवाल बताने लगी कि मेरा स्वास्थ्य सही नहीं रहता था। इसलिए मौसी को यहां छोड़ गई। मौसी कहती थीं कि घर में मन नहीं लगता।