बरेली। वसंत विहार की गलियों में एक ऐसी कहानी आकार ले रही है, जो यह बताती है कि सपने कभी मरते नहीं, बस वे पीढ़ी दर पीढ़ी अपना स्वरूप बदल लेते हैं। यह कहानी है 15 वर्षीय माही खान और उनकी मां परवीन की। माही ने अभी तक 14 स्वर्ण, तीन रजत व दो कांस्य पदक जीतकर अपनी मां का नाम रोशन किया है।
परवीन को बचपन से ही ताइक्वांडो सीखने और खेल की दुनिया में अपनी पहचान बनाने का जुनून था, लेकिन उस समय के माहौल और पारिवारिक पाबंदियों के कारण वह कभी खेल के मैदान तक नहीं पहुंच सकीं। वक्त बदला, शादी हुई और जिम्मेदारियां बढ़ गईं, लेकिन उनके भीतर का वह खिलाड़ी कहीं न कहीं जीवित रहा। जब माही का जन्म हुआ, तो परवीन ने एक दृढ़ निश्चय किया कि जो बेड़ियां उनके पैरों में थीं, वे उनकी बेटी को नहीं रोकेंगी। मात्र चार साल की उम्र में जब बच्चे ठीक से खेलना भी नहीं सीखते, तब परवीन ने माही को ताइक्वांडो कोच के पास भेजना शुरू कर दिया। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन मां के अटूट विश्वास और निरंतर प्रोत्साहन ने माही के भीतर एक विजेता की आग पैदा कर दी। धीरे-धीरे माही ने खेल की बारीकियों को समझना शुरू किया और देखते ही देखते वह पदकों की झड़ी लगाने लगी। पिछले साल दिल्ली में आयोजित ओपन इंटरनेशनल प्रतियोगिता में रजत पदक जीतकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धमक दिखाई, तो वहीं नोएडा की नेशनल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर बरेली का गौरव बढ़ाया। माही बताती हैं कि उनकी कोच साक्षी बोेरा ने हमेशा ही उनकी सहायता की है। संवाद