किताबों से अभिभावकाें को लूटने में केवल स्कूल प्रबंधन और किताब विक्रेता ही शामिल नहीं हैं, बल्कि प्रकाशक भी खूब फायदा उठाते हैं। स्कूलों ने प्रकाशकाें को ठेका दे रखा है वे बिना किसी मानक के महंगी किताबें छापकर आसानी से औने पौने दाम पर बेचते हैं। शहर में करीब दो दर्जन प्रकाशकों की किताब आपको अमूमन हर स्कूल में मिल जाएगी। जिन किताबों को एनसीईआरटी 25 से 40 में छापते हैं, वह किताबें प्रकाशक आसानी से 300 से 400 में बेच रहे हैं। पिछले साल से कुछ ज्यादा प्रकाशक आ गए हैं।
दो उदाहरण देखिए। आर्ट की एक किताब, जिसका प्रकाशक टाइम एजुकेशन है। 200 रुपये की इस किताब में मात्र चार से छह पेज हैं। वहीं, सैपायर पब्लिशर की 250 रुपये की किताब में 40 रंगीन पेज हैं। जो दिल्ली में छपती है। पेज में बेवजह रंग और महंगे कागजों का इस्तेमाल हुआ है जो सिर्फ कीमत बढ़ाने के लिए है। अब ड्राइंग की किताब को लीजिए। मात्र 4 से छह पन्नों की किताबाें में महंगा कागज प्रयोग किया गया है। इसमें लिखा कुछ नहीं है, एक्ट्रा एक्टिविटी के लिए कुछ अलग से रंगीन पेज दिए गए हैं और किताब की कीमत 200 रुपये है। इसे कक्षा एक से पांच तक के बच्चे प्रयोग करते हैं। ये महंगी किताबें सिर्फ एक साल बच्चे प्रयोग करते हैं फिर ये रद्दी हो जाती हैं।
वर्क बुक में तो काम ही नहीं कराते
स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत पियूष बताते हैं कि उनके बच्चे की कई वर्क बुक साल भर कोरी रहती है, जबकि एक बुक की कीमत 150 से 200 रुपये है। अमित खंडेलवाल बताते हैं कि वर्क बुक हिंदी, इंग्लिश और मैथ तीनों की होती है। जब साल खत्म होने लगता है तो इस पर काम कराते हैं। कभी-कभी तो यह बेकार ही चली जाती है। इसे कोई वापस नहीं लेता।
ये हैं शहर के प्रकाशक
रत्ना सागर प्राइवेट लिमिटेड
ग्राफाल्को
फन लर्न ग्रो
इंस्पीरेशन
तरुण
प्रिक्वेस्ट
लैंड मार्क
मीडियम
बुक ब्रिज
प्रेस्ट लाइन
लोटस
लर्निंग लिंक
भारती भवन पब्लिशर
प्रकाशन पब्लिशर
सैपायर
कांवेंट पब्लिकेशन
कीर्ति प्रकाशन
पितांबर पब्लिकेशन
मधुबन एजुकेशनल बुक
प्राची इंडिया प्राइवेट लिमिटेड
इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका
सुप्रीम बुक दिल्ली
(नोट- इन्हीं पब्लिशर की किताबें शहर के कांवेंट स्कूलों में चलती हैं।)
एनसीईआरटी की किताबें क्यों जरूरी
एडवोकेट और पैरेंट्स फोरम के संयोजक खालिद जिलानी कहते हैं कि एनसीईआरटी की किताबें शोध, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और उच्च स्तर के विशेषज्ञों द्वारा तैयार क राई जाती है। इनकी भाषा शैली को समझना आसान होता है। इनकी किताबाें का लेखन बड़े लेखकर करते हैं, जबकि प्राइवेट प्रकाशक आर्थिक आधार पर लेखन सामग्री देते हैं। स्कूलाें की जिम्मेदारी बनती है कि वे एनसीईआरटी की किताबें कोर्स में शामिल करें।