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नेताओं के आंसू नकली हैं, इसलिए देर से निकलते हैं

Sun, 24 Jan 2016 01:05 AM IST
बरेली
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राजनीति पल-पल में पलटा खाने वाली चीज है। कभी तत्काल प्रतिक्रिया होती है और कभी प्रतिक्रिया में देर होती है। अब मोदी जी हमेशा चार-पांच दिन बाद प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन पहले दिन से हल्ला हो जाता है कि उन्होंने मौन धारण कर लिया है। दलित छात्र की मौत के मामले में वह अब जाकर बोले हैं कि मां भारती का एक लाल चला गया। अब वह द्रवित हुए और आंसू आए। राजनीति में नकली आंसू होते हैं, इसलिए देर से निकलते हैं। ये तत्काल नहीं निकलते। कवि सम्मेलन में बरेली आए कवि अशोक चक्रधर ने राजनेताओें पर तीखी टिप्पणी करते हुए ये बातें कहीं। वह शनिवार को एक होटल में पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कवि के आंसू फौरन निकलते हैं, राजनेताओं के सोच-समझकर निकलते हैं।
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छंद और नई कविता के बहस पर व्यंग्यकार एवं कवि अशोक चक्रधर ने कहा, छंद का न होना भी कविता होता है। पहले तुक मिलाने का आग्रह नहीं होता था, लेकिन लय होती थी। प्राचीन कविता में लय और गेयता थी। छंद प्रकृति प्रदत्त नहीं हैं, मनुष्य ने गढ़े हैं। छंद के बंधन में भाव पूरे व्यक्त नहीं हो पाते। निराला ने तुकांत और अतुकांत दोनों ही तरह से लिखा।
असहिष्णुता के मामले में उन्होंने कहा, हम सदैव से असहिष्णु रहे हैं। हमने दूसरे का हक मारकर अपना पेट भरा है। ये हमारे अनेक मनोभावों में से एक है। असहिष्णुता का कारण बेरोेजगारी, अन्याय, गरीबी, विदर्भ में आत्महत्याएं भी हैं। उसका कारण अल्पसंख्यकों का असुरक्षा बोध और बहुसंख्यकों का अकारण क्रोध भी है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि हमारे जींस में सत्य और अहिंसा हैं। अगर कहीं कुछ गलत है तो उसका समाधान कानून से होना चाहिए। जल्दी न्याय मिलना चाहिए। देर से मिलने वाला न्याय भी अन्याय हो जाता है।
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कविता का विश्वविद्यालय बनाएंगे
कवि एवं व्यंग्यकार अशोक चक्रधर ने बताया कि विश्वविद्यालय में हिंदी की दशा बहुत खराब हो चुकी है। शोध का स्तर भी गिर गया है, इसलिए वह कविता का विश्वविद्यालय बनाना चाहते हैं। शब्द संधान के लिए विश्वविद्यालय बनाएंगे। जहां शब्दों पर अनुसंधान होगा।
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