मौसम की बेरुखी से रोज किसान जान दे रहे हैं इधर अवसाद के कारण कई किसान और उनके परिवार की महिलाएं मनोरोगी भी बन रहे हैं। मानसिक चिकित्सालय की ओपीडी में आंकड़ा 300 तक पहुंच गया है, इनमें कई देहात से आ रहे हैं।
बदायूं के बिनावर के एक युवा काश्तकार को उसके बूढ़े पिता यहां लाए थे। कुल पंद्रह बीघा जमीन में हमने गेहूं बोये थे। ओलावृष्टि से फसल बिछी तो बेटे की दिमागी तवाजन बिगड़ गई। गृहस्थी कैसे चलेगी? बच्चों का क्या होगा? जैसी बातें वह बड़बड़ाता है। कस्बे के डॉक्टर ने यहां भेजा है। पीलीभीत के रम्पुरिया निवासी किसान अपनी पत्नी संग यहां दूसरी बार आए थे। बताया कि चार बीघा जमीन में गेहूं बोया जो नष्ट हो गया। घर में चार बच्चे हैं। फांकाकशी की नौबत है। इस बीच पत्नी गुमसुम रहने लगीं हैं। कई डॉक्टरों को दिखाया तो पता लगा कि यह डिप्रेशन में हैं। शीशगढ़ के दंपति भी यहां थे। पत्नी का सिर गोद में रखे बैठे ग्रामीण ने बताया कि छह बीघा फसल बरबाद होने से पत्नी को गहरा सदमा लगा। बैंक का पचास हजार कर्ज भी है। पिछले दिनों बैंक की टीम घर आई, तभी से पत्नी का यह हाल है। वह चुप रहती है। बोलती है तो जाने क्या बड़बड़ाती है।
पचास से साठ मरीज बढ़े
ओपीडी रिकार्ड बताता है कि होली से पहले करीब ढाई सौ मरीज रोज आ रहे थे। अब यह तीन सौ के करीब हैं। बीच में आंकड़ा 310 तक भी पहुंचा है। जो मरीज बढ़े हैं उनमें करीब 25 ग्रामीण परिवेश के हैं। इनमें आधे ऐसे हैं जिनकी फसलों को भारी क्षति हुई है। भर्ती मरीजों की संख्या करीब 208 ही है।
यूं होता है डिप्रेशन
मानव मस्तिष्क में करीब सौ न्यूरो ट्रांसमीटर होते हैं। करीब एक अरब सेल्स इन्हीं की मदद से कम्युनिकेट करती हैं। किसी घटना से ट्रांसमीटर में उतार चढ़ाव होता है तो व्यक्ति डिप्रेशन में आ जाता है। भूख न लगना, बेचैनी, नींद न आना जैसी स्थिति आती है। डिप्रेशन भी आठ से नौ तरह के होते हैं। मेजर डिप्रेशन की स्टेज में व्यक्ति पूर्ण निराश अवस्था में आकर आत्महत्या का मन बना लेता है।
वर्जन
ओपीडी रोगियों का विस्तृत वर्गीकरण दर्ज नहीं किया जाता। हां, संकेत तो ऐसे ही हैं कि मौजूदा वक्त में किसानों में डिप्रेशन बढ़ रहा है। हालांकि दवा और एहतियात से वे ठीक हो जाएंगे।- डॉ. सुनील श्रीवास्तव, निदेशक मानसिक अस्पताल