आंवला के सांसद धर्मेंद्र कश्यप सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिए अपने गांव रोंधी के किसानों का दर्द ही भूल गए। बर्बाद हुए किसानों का हाल जानने के लिए वह इस गांव में अब तक नहीं पहुंचे हैं। रोंधी ग्राम पंचायत और उसके दोनों मजरे रफियाबाद और मिलक में लगभग 25 हेक्टेयर में से लगभग 20 हेक्टेयर गेहूं गिर गया। बाकी बचा गेहूं भी भीगने से काला हो गया है। उनकी पैरवी करने वाला कोई नहीं है। सांसद आदर्श योजना का ठप्पा लगने के बाद भी इन किसानों को अगर कोई उम्मीद नहीं है तो दूसरे सामान्य गांवों के बर्बाद हुए किसानों की दशा सहज समझी जा सकती है। एक किसान नाम ने कहा सांसद धर्मेंद्र कश्यप ने जब यह गांव गोद लिया था तो गांव की बुनियादी जरूरतें जानने के लिए बेस लाइन सर्वे को लगे कैंप में मुख्य अतिथि के रूप में सिर्फ एक बार आने के बाद से उन्होंने दुबारा आकर यहां देखना भी मुनासिब नहीं समझा है। इस बारे में सांसद का पक्ष जानने के लिए उन्हें कई बार फोन किया गया। हर बार रिंग जाती रही लेकिन सांसद ने फोन रिसीव नहीं किया।
लेखपाल ने यूं ही सर्वे लिख दिया
रोंधी गांव के किसानों ने कहा कि उन्हें नहीं मालूम कि उनके खेतों का कोई सर्वे हुआ भी है या नहीं। अगर किया गया होगा तो वैसे ही मनमाने ढंग से। लेखपाल गोपाल प्रसाद ने यह बात स्वीकार की कि उन्होंने किसानों से उनके नुकसान के बारे में कुछ नहीं पूछा लेकिन उनका कहना है कि सर्वे कर लिया है, गोपनीय ढंग से खेतों में जाकर लोगों के नुकसान का आकलन किया है। उन्होंने कहा कि अगर किसानों से पूछते तो सर्वे हो ही नहीं पाता, क्योंकि सब अपने-अपने ढंग से दावे करते। लेखपाल ने कहा कि रोंधी ग्राम पंचायत और उसके दोनों मजरों को मिलाकर सिर्फ 14 हेक्टेयर गेहूं का नुकसान हुआ है। जबकि किसानों का दावा है कि यह नुकसान 20 हेक्टेयर से कम नहीं है। इस तरह करीब 96 बीघा गेहूं के नुकसान का कम आकलन किया गया है।
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इंसेट... इनके फोटो भी अलग-अलग हैं।
गेहूं बोकर और देने पड़ गए
चार बीघा खेत में कटे पड़े गेहूं के बीच सिर पर हाथ धरे बैठे चंद्रपाल इस चिंता में डूबे हैं कि अब क्या करेंगे। उन्होंने काली पड़ीं बालियां दिखाते हुए कहा कि इन्हें देखकर कोई थ्रेसर वाला गेहूं निकालने को तैयार नहीं है, क्योंकि यह गेहूं खाने लायक भी नहीं बचा है। चार दिन से गेहूं काटकर खेतों में डाल रखा है। रात को रखवाली करनी पड़ती है। फसल से तो कुछ नहीं मिलेगा, बल्कि इसमें खर्च हुआ आठ हजार रुपये भी चला गया।
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बटाई भी कर्ज लेकर देनी होगी
मदन लाल ने नौ बीघा जमीन लेकर बटाई पर गेहूं बोया था, लेकिन कुल साढ़े छह कुंतल गेहूं मिला है। अगर बेचेंगे भी तो सात हजार रुपये मिल पाएंगे। जबकि बटाई पर खेत एक हजार रुपये बीघा पर लिया था इसलिए बाकी दो हजार रुपये अपनी जेब से देने होंगे। लगभग 18 हजार रुपये गेहूं बोने की लागत बतौर पहले ही अपनी जेब से लगा चुके हैं।
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खेत में लगा दी आग
टूटेफूटे घर के बाहर खड़े लल्लूराम से जब गेहूं के नुकसान के बारे में पूछा तो बोले- खेत देख आइए। सारे गेहूं में अपने हाथ से आग लगानी पड़ी। छह बीघा जमीन पर गेहूं बोया था। लागत तो गई ही, अगर गिरकर खराब हुई सारी फसल से गेहूं निकलवाते तो और खर्चा आता। वैसे भी अब पैसा ही नहीं रह गया है। सरकार मुआवजा की बात कह रही है लेकिन कोई यह पूछने भी नहीं आया है कि कितना नुकसान हुआ।
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बीनना पड़ा एक-एक पौधा
घर के बाहर खड़ी बैलगाड़ी के पास खड़े सुखपाल ने बताया कि 20 बीघा जमीन पर गेहूं बोया था, सारा गेहूं गिर गया। एक-एक पौधे को बीन-बीनकर गठ्ठर बनाए हैं। तीन दिन से थ्रेसर बालों की मान-मनौव्वल कर रहे हैं कि गेहूं निकाल दो लेकिन फसल खराब होने की वजह से कोई भी ट्रेक्टर वाला गेहूं निकालने को तैयार नहीं हो रहा है।
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भूसा भी खराब निकला
गांव में खड़े नीम के पेड़ से टिके किशोर के चेहरे पर नुकसान का दर्द साफ नजर आया। उसने बताया कि उसकी साढ़े पांच बीघा में बोई गेहूं की सारी फसल बर्बाद हो गई। गेहूं तो खाने लायक नहीं ही बचा है, भूसी भी खराब हो गई है। इसे जानवर भी मुश्किल से खाएंगे। ओमनंदन की भी पांच बीघा गेहूं की फसल गिर गई। उन्होंने तो उसका भूसा भी नहीं उठाया।