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जंग से कम नहीं था जवानों के परिवारों को उनके शहीद होने की खबर देना

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कारगिल की पहाड़ियों पर 18 साल पहले अदम्य साहस और पराक्रम से दुश्मन को धूल चटा देने की यादें कारगिल विजेताओं में आज भी जोश जगा देती हैं। मगर जब इस विजय गाथा के साथ शहीद हुए साथियों की यादें ताजा होती हैं तो आंखें आंसुओं से भी भर जाती है। कारगिल की यादों पर भावुक योद्धा कहते हैं कि उस जंग में जवानों की शहादत की खबर उनके परिवार वालों को देना भी किसी जंग से कम नहीं था।
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पिता गुजर गए, घरवालों ने नहीं दी खबर
फौज के बॉम्बे सैपर्स के 101 इंजीनियर विंग में तैनात रहे करगैना में रहने वाले हवलदार प्रथमेश गुप्ता को उस जंग में जीत के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। हवलदार प्रथमेश बताते हैं कि जंग शुरू होने के बाद उन्हें एडवांस पुल बनाने की जिम्मेदारी मिली थी। पाकिस्तानी सेना काफी ऊंचाई पर थी जो वहां से भारतीय सेना पर लगातार बम बरसा रही थी। इस गोलाबारी के बीच दिन-रात पुलों का निर्माण जारी रहा। आगे पुल बनता था और पीछे से देश की सेना आगे बढ़ती रहती थी। युद्ध के दौरान परिवार वालों ने उन्हें पिता की तबियत खराब होने तक की सूचना नहीं दी। जब वह जंग से लौटे तो पिता के निधन का समाचार मिला।

शहादत की सूचना देते-देते खुद भी रो देते थे
युद्ध के दौरान सूचना तंत्र प्रणाली को सेना की ‘बैक बोन’ माना जाता है। कर्मचारी नगर में रहने वाले मंसूर अहमद खान ने बताया कि उस दौरान वे उधमसिंह नगर से थोड़ी ऊंचाई पर तैनात थे। यहां से फैक्स, टेलीफोन, सेटेलाइट फोन के जरिये युद्ध की स्थिति की सूचना दिल्ली और दिल्ली से प्राप्त सूचना सेना को दी जाती थी। सूचनाएं इतनी महत्वपूर्ण होती थीं कि इन्हें भेजने में जरा सी भी लापरवाही देश पर भारी पड़ सकती थी। युद्ध में जवानों के शहीद होने की सूचना उनके परिवार वालों को देना और भी कठिन काम था। कॉल कर यह बताना कि उनका ‘बेटा’ या ‘भाई’ या ‘पिता’ शहीद हो गए हैं, यह भी एक जंग से कम नहीं लगता था। खुद की भी आंखें भर आती थीं।
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वो हैलीकॉप्टर क्रैश होता तो नहीं जीत पाते जंग
वीरसावरकर नगर में रहने वाले सूबेदार एमपी शर्मा आर्मी सप्लाई कोर डिपो की टीम में शामिल थे। उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान सारा सामान गोपनीय जगह कुव्वाडा में रखा हुआ था। यहां पर हैलीकॉप्टर आते और राशन, आर्म्स और जरूरत का दूसरा सामान लेकर तत्काल लौट जाते थे। युद्ध जब अपने चरम पर था तब अचानक एक दिन 9-10 पैरा को डेप्लॉय किया जाना था। जैसे ही हैलीकॉप्टर आया उसे लोड करने के लिए लोग दौड़ पड़े। आर्म के साथ दूसरा सामान लोड कराया लेकिन उड़ते ही हैलीकॉप्टर का एक विंग पेड़ से टकरा गया। इत्तफाक से कोई हादसा नहीं हुआ, लेकिन अगर हादसा होता तो शायद कारगिल विजय न होती।
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