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आज से शुरू हो रहे पितृपक्ष, नाराज हैं पितृ तो पिंडदान कर मना लें

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कपकोट के सरयू तट पर ऋषितर्पण करते पंडित जन (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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- 13 से 28 सितंबर तक पितृपक्ष का मान, 29 को होगा मातामाह श्राद्धकर्म

बरेली। पितरों को शांत करने और पितृदोष से मुक्ति दिलाने वाला पितृपक्ष शुक्रवार से शुरू हो रहे हैं। समापन 28 सितंबर को होगा। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक अबकी बार 13 सितंबर आश्विन कृष्ण पक्ष (पितृ पक्ष) पूर्णिमा का श्राद्ध 13 सितंबर को होगा। इसी के साथ पितृपक्ष शुरू हो जाएंगे। 28 सितंबर को पितृ विसर्जन के साथ समाप्त होगा। उन्होंने लोगोें से विधि विधान से पितरों का श्राद्धकर्म करने को कहा है।
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ज्योतिषाचार्य पं. नीरज शर्मा के मुताबिक अनंत चतुर्दशी के बाद शुक्रवार (13 सितंबर) को पूर्णिमा है। पूर्णिमा श्राद्ध से पितृपक्ष शुरू हो जाएंगे। बताया प्रत्येक मास की अमावस्या को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है, लेकिन भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पूरा पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है। 16 दिनों के पितृपक्ष में पितर पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। पितरों का पिंड दान और तिलांजलि कर उन्हें संतुष्ट करना चाहिए। श्राद्ध के सोलह दिनों तक लोग पितरों को जल देते हैं और मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। बताया कि वैसे तो 15 सितंबर को कुतप बेला में प्रतिपदा न मिलने से प्रतिपदा द्वितीया का श्राद्ध 14 सितंबर को होगा। क्योंकि इस दिन कुतप बेला में प्रतिपदा मिल रही है। 16 सितंबर को मध्याह्न तिथि न मिलने से श्राद्ध नहीं होगा।

दशमी और एकादशी एक ही दिन
24 सितंबर को सूर्योदय छह बजे और दशमी तिथि सुबह 11.42 बजे तक है। इसके बाद एकादशी लग रही है। दिन के मध्य समय में दोनों तिथियों का योग होने से दशमी और एकादशी तिथि में दिवंगत पितरों का श्राद्ध 24 सितंबर को ही होगा। 16 सितंबर को मध्यान्ह तिथि न मिलने से श्राद्ध नहीं होगा।
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तर्पण और पिंडदान का महत्व
पितृपक्ष के दौरान पितरों के आत्मा की शांति की लिए पिंडदान और तर्पण किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पूजा की जाती है। इस दौरान पितरों की पूजा न करने से पूर्वजों को मृत्युलोक में जगह नहीं मिलती है और उनकी आत्मा भटकती रहती है।

जौ तिल से तृप्त होते हैं पितृ
ज्योतिषाचार्य पं. सोनू मिश्रा ने बताया कि जौ, तिल जल में मिलाकर अंजलि से पितरों के लिए दिया जाता है। इसे ही ‘तर्पण’ कहते हैं। मान्यता है कि भगवान विष्णु के पसीने से तिल की उत्पत्ति हुई है और रोम से जौ। इसलिए जो व्यक्ति पितरों के निमित्त जौ, तिल और जल से तर्पण करता है तो पितरों को सद्गति प्राप्त होती है और उग्रता शांत होती है। बताया कि तर्पण में कुश का प्रयोग होता है। क्योंकि कुश की जड़ में ब्रह्मा, मध्य में श्री विष्णु, अग्र भाग में भगवान रुद्र का वास है।

कुतप बेला में करें श्राद्ध, तर्पण
ज्योतिषाचार्य पं सोनू मिश्रा के मुताबिक 13 सितंबर को सूर्योदय 5.52 बजे और भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी सुबह 6.38 बजे तक है। इसके बाद पूर्णिमा तिथि शुरू हो रही है जो 14 सितंबर को सुबह 8.41 बजे तक है। 13 सितंबर को कुतप बेला (कनागत में दिन का 8वां मुहूर्त सुबह 11.36 बजे से दोपहर 12.24 बजे तक का समय) में पूर्णिमा और 14 सितंबर को कुतप बेला में प्रतिपदा होने से पूर्णिमा का श्राद्ध 13 और प्रतिपदा का श्राद्ध 14 सितंबर को होगा। 13 सितंबर से ही महालया शुरू हो जाएगा।

श्राद्ध की तिथियां
पूर्णिमा श्राद्ध 13 सितंबर, प्रतिपदा श्राद्ध 14 सितंबर, द्वितीया श्राद्ध 15 सितंबर, तृतीया श्राद्ध 17 सितंबर, चतुर्थी एवं भरणी श्राद्ध 18 सितंबर, पंचमी श्राद्ध 19 सितंबर, षष्ठी श्राद्ध 20 सितंबर, सप्तमी श्राद्ध 21 सितंबर, अष्टमी श्राद्ध 22 सितंबर, नवमी (मातृ नवमी भी) श्राद्ध 23 सितंबर, दशमी और एकादशी श्राद्ध 24 सितंबर, द्वादशी श्राद्ध 25 सितंबर, त्रयोदशी श्राद्ध 26 सितंबर, चतुर्दशी श्राद्ध 27 सितंबर, सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध 28 सितंबर (पितृ विसर्जन), मातामह श्राद्ध 29 सितंबर को होगा।
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इन बातों का रखें ध्यान
- लोहे के बर्तनों का प्रयोग न करें
- दूसरे के घर खाना न खाएं, शरीर पर तेल न लगाएं
- वाहन या अन्य वस्तुओं की खरीदारी न करें
- दरवाजे पर आए भूखे व्यक्ति को जरूर भोजन कराएं।
- पशु-पक्षियों के लिए भी खाना रखें
- पुरुष दाढ़ी या बाल नहीं बनवाएं
- सात्विक भोजन से पितरों को भोग लगाएं।
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