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जाट म्यूजियम में लगेंगी दस शहीदों की प्रतिमाएं

Fri, 18 Nov 2016 01:40 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बरेली
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Jat Museum will have ten statues of martyrs - फोटो : बरेली, अमर उजाला
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20 नवंबर को अपनी स्थापना के 221 वर्ष पूरे करने जा रही जाट रेजीमेंट का इतिहास गौरवशाली है। दो शताब्दी में जाट वीरों ने देश के लिए कई कुर्बानी देकर भारतवर्ष का गौरव बनाए रखा है। विश्व युद्ध में भी जाट वीरों ने दुश्मनों के दांत खट्टे किए हैं। जाट रेजीमेंट सेंटर ने जाट वीरों के इतिहास और उपलब्धियों को म्यूजियम में संजोया है। म्यूजियम में दो अशोक चक्र विजेता और दो महावीर चक्र विजेता समेत दस शहीद जवानों की प्रतिमाओं का अनावरण किया जाएगा। 
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जाट की स्थापना 1795 में अंग्रेजी हुकूमत ने बटालियन के रूप में की थी। तब इस बटालियन को ईस्ट इंडिया कंपनी की संपत्ति की सुरक्षा के लिए कोलकाता में लगाया गया था। 1859 में इसको इन्फेंट्री यानी पैदल सेना का रूप दे दिया गया। 1922 में देश में जब सेना का सबसे बड़ा और अंतिम पुनर्गठन हुआ तो जाट को रेजीमेंट का दर्जा मिला। उस साल एक जनवरी को बरेली को इसका मुख्यालय बनाकर यहां शिफ्ट करके इसको रेजीमेंट घोषित कर दिया गया था। 

13वीं बटालियन को नहीं मिला नाम
प्रथम विश्वयुद्ध में बेहतर प्रदर्शन करने पर रेजीमेंट की प्रथम बटालियन को रॉयल और लाइट का खिताब दिए जाने के बाद मैकनाइज रेजीमेंट में तब्दील कर दिया गया। इसकी 10वीं बटालियन को ट्रेनिंग सेंटर का दर्जा मिल गया है और 13वीं बटालियन का नामकरण अशुभ अंक की वजह से नहीं हो सका। वर्तमान में रेजीमेंट की 19 एक्टिव बटालियन हैं। चार राष्ट्रीय रायफल बटालियन और दो प्रादेशिक सेना के रूप में कार्य कर रही हैं। 23वीं बटालियन की स्थापना हाल ही में की गई थी।
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म्यूजियम में है गदर वाली बंदूकें
1857 में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मजल लोडिंग वाली जिन बंदूकों को लेकर जंग छिड़ी थी, वे जाट रेजीमेंट सेंटर के म्यूजियम में हैं। ऐसी 13 बंदूकों को रामपुर के तत्कालीन नवाब ने जाट रेजीमेंट को भेंट किया था। इन बंदूकों को लोड करने के लिए चर्बी का इस्तेमाल होता था, जिसके विरोध से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत की गई। रामपुर के नवाब की ओर से भेंट किए गए फ्लावर पुट और भी म्यूजियम में हैं।

बाकी हैं विभाजन की परेड के निशां
जाट सेंटर के म्यूजियम में 15 अगस्त 1947 की आजादी के दौरान का वह एतिहासिक चित्र भी देखने को मिलता है, जिसमें बरेली में रेजीमेंट की परेड के बाद नौ सौ से ज्यादा जवान विभाजन में पाकिस्तान चले गए थे। रेजीमेंट के 996 अफसरों और जवानों को उनकी मर्जी से पाकिस्तान जाने दिया गया और विभाजित पाकिस्तान से 901 जवान भारत आकर जाट रेजीमेंट का हिस्सा बने।
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