फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

UP News: परीक्षण के लिए विकसित की चूहों की विशेष प्रजाति, आईवीआरआई के वैज्ञानिकों ने किया कमाल

Mon, 16 Feb 2026 09:32 AM IST
मुकेश कुमार अजीत प्रताप सिंह, अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

सार

बरेली के इज्जतनगर स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने बड़ी उपलब्ध हासिल की है। यहां के वैज्ञानिकों ने परीक्षण के लिए चूहों की विशेष प्रजाति इंडीमस विकसित की है।
विज्ञापन
आईवीआरआई में विकसित चूहों की इंडीमस प्रजाति - फोटो : आईवीआरआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

वैक्सीन, डायग्नोस्टिक किट, दवाओं आदि के परीक्षण के लिए भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के वैज्ञानिकों ने चूहों की विशेष प्रजाति इंडीमस विकसित की है। 2025 में विकसित प्रजाति को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने पंजीकृत किया है।

विज्ञापन


पशु आनुवांशिकी विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक, पशुओं और मनुष्यों में बीमारियों की रोकथाम के लिए बनाई जा रही डायग्नोस्टिक किट, टीके, दवाओं के लैब में परीक्षण के लिए इंडीमस प्रजाति के चूहों का प्रयोग किया जा रहा है। नतीजे विदेश से मंगाए जा रहे चूहों की प्रजाति के सापेक्ष ज्यादा सटीक और प्रमाणिकता 99 फीसदी से ज्यादा है। जल्द ही ये चूहे सरकारी और निजी संस्थानों में शोध कार्य के लिए प्रयोग किए जाएंगे। 

यह भी पढ़ें- अलंकार अग्निहोत्री का बड़ा एलान: बोले- जल्द बनाएंगे पार्टी, सामान्य और ओबीसी मतदाता भाजपा से हुए दूर
विज्ञापन


इस प्रजाति पर शोध का परिणाम विदेशी नस्ल के चूहों से बेहतर और प्रमाणिक सिद्ध होंगे। डॉ. पुष्पेंद्र ने बताया कि चूहों की आनुवंशिक, जैविक, शारीरिक संरचना मनुष्यों और पशुओं से मिलती है। उनका जीवन चक्र दो से तीन वर्ष का होता है। आकार छोटा होने से इनके रखरखाव में आसानी होती है। इन पर शोध परिणाम का आकलन भी तेजी से कर सकते हैं।

Trending Videos

आनुवंशिक गुणों में एकरूपता के उद्देश्य से शुरू हुआ था शोध
डॉ. पुष्पेंद्र के मुताबिक, कई बार विदेशी चूहों पर प्रयोग के बाद परिणाम में काफी अंतर दिखता है, क्योंकि वातावरण में बदलाव के साथ उनके आनुवंशिक गुणों में अंतर आ जाता है। प्रकृति और व्यवहार भी बदल जाता है। लिहाजा, भारतीय वातावरण के अनुकूल चूहों की नस्ल विकसित करने के लिए शोध शुरू हुआ, ताकि बड़ी तादाद में चूहों की जरूरत भी न पड़े और परिणाम भी सटीक रहे।
विज्ञापन

आठवीं पीढ़ी से आनुवंशिक गुणों में आने लगी एकरूपता
विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पुष्पेंद्र कुमार ने  बताया कि 55 जोड़ी स्विस एल्बीनो आउटब्रिड चूहों को आधार बनाकर शोध शुरू हुआ। जो चूहे जन्मे, उन्हें भी एक पिंजरे में रखा ताकि आनुवांशिक गुण समान हों। प्रत्येक पीढ़ी के साथ चूहों के आनुवंशिक गुण आंकने के लिए माइक्रो सेटेलाइट जेनेटिक मार्कर से जांच की गई। आठवीं पीढ़ी से समानता नजर आने लगी। एकरूपता 99 फीसदी तक पहुंचने के लिए आठ साल तक 13,500 चूहों पर परीक्षण किए गए। 20वीं पीढ़ी में अनुकूल परिणाम मिला।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें