मुस्लिम समाज में चर्चा और बहस का मुद्दा बना दावतनामे का मजमून
बरेली। तीन तलाक के बाद अब बरेली में मुस्लिम औरतों पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में पर्दे की पाबंदी चर्चा में है। हाल ही में बहेड़ी में एक शादी के दावतनामे पर लिखी गई यह हिदायत बहस का मुद्दा बन गई है कि बेपर्दा औरतें शादी में शिरकत करने न आएं। दरअसल कुछ ही समय पहले दरगाह आला हजरत से शादी-ब्याह जैसे कार्यक्रमों में गैर शरई रस्मोरिवाज से बचने की अपील की गई थी। दरगाह के सज्जादानशीन की अगुवाई वाले संगठन टीटीएस की ओर से ऐसे परचे भी बांटे जा रहे हैं जिसमें उन शादियों में शिरकत करने की साफ मनाही की गई है जहां बेपर्दा औरतें शामिल हों।
जिस शादी में बेपर्दा औरतों को आने की मनाही की गई है, वह बहेड़ी में 27 मार्च को होनी है। इस शादी का दावतनामा बरेली में भी तमाम लोगों को भेजा गया है। इसी वजह से यह चर्चा में है। कुछ ही समय पहले आला हजरत दरगाह के सज्जाजानशीन मुफ्ती अहसन रजा खां कादरी की ओर से काजी और मौलवियों के नाम एक अपील जारी की गई थी जिसमें ऐसी किसी जगह निकाह न पढ़ाने को कहा गया था जहां बैंड-बाजा, आतिशबाजी, डीजे का इस्तेमाल हो या फिर नाच-गाने का आयोजन किया जाए। आम लोगों से भी अपील की गई थी कि वे शादी-ब्याह में गैर शरई रस्मों और फिजूलखर्ची से दूर रहें।
इसके साथ सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन रजा कादरी की अगुवाई वाला संगठन तहरीके तहफ्फुजे सुन्नियत यानी टीटीएस एक पर्चा भी कुछ दिनों से बांट रहा है जिसमें तमाम और नसीहतों के साथ बेपर्दगी का भी जिक्र किया गया है। हिदायत दी गई है कि शादी की जिस महफिल में बेपर्दा औरतें शरीक हों या अजनबी मर्द और औरतें घुलमिल कर शामिल हों उसमें कोई हरगिज शिरकत न करे। उन शादियों से भी दूर रहने को कहा गया है जिसमें खड़े होकर खाने-पीने का इंतजाम हो। उलमा और इमाम को इन हिदायतों पर कड़ाई से अमल करने को कहा गया है।
इधर औरतों का नजरिया..
पर्दा तो नजरों का होता है। आम तौर पर वैसे भी मुस्लिम शादी समारोह में औरतों और मर्दों के लिए बैठने और खाने का इंतजाम अलग-अलग होता है। अगर कहीं यह व्यवस्था नहीं है तो वहां भी सब एक साथ बैठकर खाना खा सकते हैं। हम कोई और नजरिया बनाएं ही क्यों। हम जिनके बीच होते हैं, उन्हें अपना भाई, अंकल या बड़ा मानकर भी तो रह सकते हैं। - फरहत नकवी, अध्यक्ष मेरा हक फाउंडेशन
वैसे तो पर्दा कोई खराब बात नहीं है मगर इसे जबरदस्ती औरतों पर थोपना ठीक नहीं है। सभी को अपनी तरह से जीने की आजादी है। कोई कैसे रहना चाहता है, देश के संविधान ने भी यह स्वतंत्रता दी है। अगर कोई खुद ही इस्लामी एतबार से पर्दा करना चाहता है तो ठीक बात है मगर जबरन यह पाबंदी लागू नहीं करनी चाहिए। - निदा खान, अध्यक्ष आला हजरत हेल्पिंग सोसाइटी
यह बहुत गलत बात है। इस्लाम के नाम पर ऐसा करना गलत है। मोहम्मद साहब ने ऐसा कभी नहीं कहा। उन्होंने तो औरतों को पढ़ाई और कारोबार तक की आजादी दी। यह मुस्लिम लड़कियों को बांधकर रखने की बात है। इस्लाम की जो असलियत है, वह कभी नहीं बताई जाती, अपना अलग कानून बनाना चाहते है। - समयुन खान, अध्यक्ष आम औरत सेवा समिति