गलवन घाटी में चल रहे विवाद पर पूर्व सैनिकों ने बैठक कर निशुल्क सेवा देने का रखा प्रस्ताव
बरेली। भारत और चीन के बीच लद्दाख सीमा पर तनाव चरम पर पहुंच गया है। हिंसक झड़प में भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हो गए हैं। विवाद आगे और बढ़ेगा ऐसी संभावना पूर्व सैनिकों ने जताई है। उनके मुताबिक यह वही गलवन घाटी है, जहां साल 1962 में चीन ने भारत को धोखा दिया था और युद्ध छिड़ गया था। अगर अबकी बार भी टकराव बढ़ा तो पूर्व सैनिक भी निशुल्क सेवा देने के लिए तैयार हैं। सैनिकों की शहादत से पूर्व सैनिकों का लहू भी खौल रहा है। उनका कहना है कि सरकार इजाजत दे तो वह अभी भी सरहद पर जाने को तैयार हैं।
पूर्व सैनिकों ने बताया कि गलवन घाटी का नाम वहां बहने वाली नदी के नाम पर है। यह लद्दाख का क्षेत्र है। साल 1962 में दोनों देशों के बीच हुए युद्ध में भारत-चीनी सैनिकों के बीच यहीं टकराव हुआ था। चीनी सेना हमेशा से ही विवादित क्षेत्रों में टेंट लगाकर उकसावे का काम करती रही है। हाल ही में चीन की पीपीए ने ऐसा करने की कोशिश को तो भारतीय पक्ष ने उसे रोका, जिसे लेकर दोनों पक्षों में झड़प हुई थी। बताया कि 58 साल पहले इसी घाटी में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ था। ऐसे में एक बार फिर उसी जगह पर दोनों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। कुछ दिन पहले ही दोनों देशों ने वार्ता के जरिए विवाद को सुलझाने का प्रयास किया था, लेकिन इसका कोई परिणाम सामने नहीं आया है।
रक्षा मंत्रालय को भेजा जाएगा प्रस्ताव
एक्ससर्विस मैन कोआर्डिनेशन कमेटी के पदाधिकारियों ने बुधवार को आपातकालीन बैठक कर सीमा पर चल रहे विवाद में सहयोग करने की इच्छा जाहिर की। प्रदेश अध्यक्ष जेेएस भाकुनी ने गलवन घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हुए संघर्ष में शहीद हुए भारतीय जांबाजों के बलिदान को नमन करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। साथ ही, सरकार को आवश्यकता पड़ने पर अपनी निशुल्क सेवाऐं अर्पित करने का प्रस्ताव पारित किया। जिसे रक्षा मंत्रालय भेजा जाएगा। बैठक में महासचिव राकेश विद्यार्थी, उपाध्यक्ष इकबाल हुसैन, कैप्टन रामलाल, प्रथमेश गुप्ता, विक्रम सिंह व अन्य पूर्व सैनिक मौजूद रहे।
पहले हटा था, अब फिर चीन पीछे हटेगा
पूर्व जिला सैनिक कल्याण अधिकारी लेफ्टीनेंट कर्नल एलएन त्रिवेदी का कहना है कि भारत की दृढ़ इच्छाशक्ति, सशक्त प्रत्युत्तर और प्रभावी कूटनीति का परिणाम ही है कि आज दुनिया के तमाम देश भारत से विवाद लेने को तैयार नहीं है। भारत जैसे को तैसा जवाब देने में सक्षम है। इस नीति का ही परिणाम है कि पिछले दिनों चीन की सेना के कदम पीछे हटे थे। अब फिर आगे बढ़े हैं तो उन्हें फिर से सबक सिखाने में भारत की सेना देरी नहीं करेगी।
चीन को भारी पड़ सकती है दखलंदाजी
पूर्व सैनिक केएस रावत का कहना है कि सीमा पर चीन की दखलंदाजी अब बर्दाश्त करना सही नहीं है। कहा, अब भारत अपनी सैनिक शक्ति से विश्व के सर्वेश्रेष्ठ शक्तिशाली देशों में शामिल हो गया है। जिसके चलते भारतीय सेना का हर जवान गौरवान्वित है। इसी वजह से अमेरिका, पाकिस्तान और अब चीन भी भारत की सैन्य शक्ति का लोहा मानता है। यह सैन्य शक्ति वर्तमान राजनीतिक क्षमता का परिणाम है। चीन अब भारत के सामने टिक नहीं सकेगा।
खाली नहीं जाएगा भारतीय सैनिकों का बलिदान
पूर्व सैनिक जेएस भाकुनी का कहना है कि चीन कोरोना से दुनिया के सभी देेशों का ध्यान भटकाना चाह रहा है। इसलिए यह छदम युद्ध की नीति अपना रहा है। यही मुख्य वजह है कि वह बॉर्डर पर भारतीय सेना से छेड़छाड़ कर रहा है। साल 1962 में भले ही भारत को चीन ने हराया हो लेकिन चार साल बाद ही भारत ने चीन को बैकफुट पर ला खड़ा किया था। एक बार फिर से वही समय आ गया है जब चीन को भारत की शक्ति का एहसास कराया जाए।