चोटिल होने से आंतरिक जख्म मौत की वजह बने होंगे। हालांकि ग्रामीणों की ओर पत्थरों की बौछार होती रही, लेकिन वह चोटिल नहीं हुई। बस भागती रही। आशंकाओं से इतर आईवीआरआई की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इसमें भूख और प्यास समेत सदमे से बाघिन की मौत की पुष्टि हुई है। उसके शरीर में पानी की बूंद तक नहीं थी। आंतें सूख गई थीं। डिहाइड्रेशन की चपेट में थी। तर्क है कि लंबे समय से बिना भोजन, पानी के बाघिन बेहद कमजोर हो गई थी।
आबादी में पहुंचने से दहशत में थी। खुद को सुरक्षित करने के लिए घरों के चक्कर काट रही थी। घेराव और पथराव सदमे की वजह बना होगा। हालांकि, सदमे की सही वजह तलाशने के लिए वैज्ञानिक जांच कर रहे हैं। रिपोर्ट दुधवा नेशनल पार्क के अधिकारियों को भेजने की बात कही है।
सप्ताह में भूख और प्यास से हुई दूसरी मौत
दुधवा मैलानी रेंज बफरजोन की बाघिन से पहले पीलीभीती में एक तेंदुए की मौत भी हुई थी। तेंदुए की मौत के बाद भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) में हुए पोस्टमार्टम में पता चला कि तेंदुए की आतें खाली पड़ी थीं। उसको कई दिनों से खाना नहीं मिला था। जीभ में पशुओं के बाल थे। पूंछ में जख्म था, जिसमें कीड़े पड़े होने की वजह से संक्रमण फैलने लगा था।
व्यस्क थी बाघिन, हमले में भी थी सक्षम
वैज्ञानिकों के मुताबिक, बाघिन व्यस्क यानी करीब चार साल की थी। उसके पंजे, नाखून की जांच से पता चला है कि वह शिकार करने में पूरी तरह सक्षम थी और शिकार भी किए थे। बावजूद इसके उसके पेट में मांस का एक टुकड़ा नहीं मिला। ऐसे में आशंका है कि वह हमले महज खुद को सुरक्षित करने के लिए कर रही थी। पानी भी नहीं पिया। आगे की जांच में इन तथ्यों का पता चलने की संभावना है।
भोजन, पानी से दूरी यानि बीमारी की आशंका
वन्य जीव विशेषज्ञ अनिल साहनी के मुताबिक, शिकार और पानी से लंबे समय तक दूरी की वजह सामान्य नहीं है। आशंका है कि वह किसी गंभीर रोग से पीड़ित हो। लिवर, पेट की तकलीफ के चलते वन्य पशु को भूख नहीं लगती। इससे खाना, पीना छोड़ देते हैं। बीमारी की हालत में अन्य जंगली जानवर उस पर हमला न कर दें, इसलिए वह जंगल से बाहर बफरजोन में निकली होगी। भीषण गर्मी में भूख और प्यास से शरीर में निर्जलीकरण होना स्वावभाविक है। वहीं, घेराव होने से बचाव की छटपटाहट में उसे शॉक यानी सदमा लगने की आशंका है।
बाघों के संरक्षण में मिली है सीएटीएस मान्यता
दुधवा टाइगर रिजर्व को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन कैट्स (कंजरवेशन एश्योर्ड टाइगर स्टैंडर्ड) की मान्यता प्राप्त है। मगर भूख और प्यास से बाघिन की मौत की पुष्टि बेहतर संरक्षण, रखरखाव के दावों पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। राष्ट्रीय पशु बाघ की सुरक्षा पर सालाना करोड़ों का बजट बाघों के संरक्षण पर खर्च हो रहा है। ऐसे में बाघिन की मौत अधिकारियों की निगरानी, नियमित जांच के दावों की पोल खोल रही है।
आशंका : टूटा था केनाइन दांत, शिकार में कठिनाई
पोस्टमार्टम में बाघिन का एक केनाइन दांत भी टूटा मिला था। विशेषज्ञ ने संभावना जताई है कि केनाइन दांत टूटने से शिकार करना कठिन हो जाता है। ऐसे में शेर, बाघ, चीता, तेंदुआ शिकार के लिए छोटे जानवरों को चारा बनाना शुरू कर देते हैं। इनके अभाव में वह जंगल के बाहर निकलने पर आदमखोर और नरभक्षी हो जाते हैं। आबादी क्षेत्र में बाघिन पहुंचने के पीछे इस वजह से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वह भी नरभक्षी हो।