जिला अस्पताल में नवजात बच्चों की मौत का सिलसिला नहीं थम रहा। इंतजाम की कमी और स्टाफ की मनमानी से मंगलवार रात दो नवजात बच्चों की और जान चली गई। क्यारा क्षेत्र से एनआईसी में भर्ती हुए एक बच्चे ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया तो बर्न वार्ड में भर्ती एक महिला की डिलीवरी वहीं कर दी गई। जब तक डॉक्टर आईं, बच्चे का सिर बाहर आ गया। डॉक्टर ने रिकार्ड में बच्चे को मरा हुआ पैदा होना दर्शा दिया। दोनों ही मामलों में परिवार के लोग स्टाफ पर लापरवाही का आरोप लगा रहे हैं।
दरअसल, जिला अस्पताल में मासूमों की जान बचाने के लिए एक ओर इंतजामों की कमी है और दूसरी ओर इंतजाम हैं, वे भी अफसरों की उदासीनता की वजह से ठप पड़े हुए हैं। यहां नवजात और मासूम बच्चों की मौत का आंकड़ा इसी कारण बड़ा होता जा रहा है। यह अलग बात है कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी फिर भी इन मौतों को मेडिकल की भाषा में स्वाभाविक साबित करने की कोशिश में जुटे हुए हैं।
बता दें कि प्री मैच्योर यानी समय से पहले जन्म लेने वाला बच्चे को ऑक्सीजन, न्यूट्रिशियन, गर्माहट देने के साथ संक्रमण से बचाने की जरूरत होती है। वेंटीलेटर और रेडिएंट वार्मर इसके लिए सबसरे ज्यादा जरूरी है, लेकिन जिला अस्पताल के बच्चा वार्ड का वेंटीलेटर चलता नहीं है और रेडिएंट वार्मर भी अक्सर खराब रहता है। ऑक्सीजन चल रही है तो तापमान स्थिर रखने की मशीन खराब रहती है। जन्म के दौरान पीलिया की समस्या से ग्रसित बच्चों को बचाने के लिए छह फोटो थेरेपी मशीन लगी हुई है। हालत इतनी खराब है कि इन सभी की लाइट ठीक से काम नहीं करती है। एनआईसीयू में करीब 20 लाख रुपये की कीमत का बेकार पड़ा वेंटीलेटर अब कमिश्नर के आदेश पर जरूर चालू करने की कोशिश की जा रही है।
... मौत का एक कारण यह भी
आमतौर पर जिला महिला अस्पताल में जन्म लेने वाले बच्चाें को यहीं ट्रांसफर किया जाता है। उनको मां का दूध पिलाने के लिए तीमारदार 50 मीटर की दूरी तय करके उनकी माताओं के पास ले जाते हैं। ऐसे में बच्चों के संक्रमण का शिकार होने का गंभीर खतरा रहता है।
कमिश्नर ने देखा जिला अस्पताल का हाल
कमिश्नर पीवी जगनमोहन बुधवार को जिला अस्पताल पहुंचे। ओपीडी के अलावा बच्चा वार्ड का हाल लिया। तीमारदारों से मुलाकात कर एनआईसीयू का भी दौरा किया। अत्यधिक भीड़ देखकर तुरंत मरीजों को 100 बेड के अस्पताल में शिफ्ट करने को कहा है। निर्देश दिया कि जब तक बीमारी का मौसम है तब तक नई बिल्डिंग में अतिरिक्त 25 से 30 बेड लगाए जाएं और यहीं बच्चाें को भर्ती करें।
जिला अस्पताल ने भेजी बच्चाें की मौत पर रिपोर्ट
जिला अस्पताल ने बच्चों की मौत पर कमिश्नर और जिला प्रशासन को भी रिपोर्ट भेजी है। इसमें कहा है कि करीब साढ़े सात सौ बच्चे एक माह में भर्ती हुए थे जिनमें से 22 नवजात के साथ 38 बच्चों की मौत हुई है। इस रिपोर्ट में माना गया है कि वेंटीलेटर न होने से बच्चों को बचाना मुश्किल होता है।
बच्चा वार्ड को दूसरे वार्ड में शिफ्ट किया गया है। इसके लिए आठ अतिरिक्त डॉक्टरों की टीम लगाई गई है। जब तक बीमारी का मौसम रहेगा तब तक बच्चाें को दूसरे वार्ड में भर्ती किया जाएगा। वेंटीलेटर भी दो दिन में शुरू हो जाएगा। रेडिएंट वार्मर की शिकायत नहीं आई है। - डॉ. केएस गुप्ता, सीएमएस
प्राइवेट डॉक्टर बोले...
समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे सांस नहीं ले पाते। इन्हें जिंदा रखने के लिए रेडिएंट वार्मर, ऑक्सीजन और वेंटीलेटर की जरूरत पड़ती है। एपेक्सिया पीड़ित बच्चों में ऑक्सीजन ब्रेन तक नहीं पहुंच पाती है। इनको सपोर्ट थेरेपी की जरूरत पड़ती है। सेप्टीसीमिया इंफेक्शन है जो नवजातों में जन्म से और जन्म के बाद भी हो सकता है। वेंटीलेटर के लिए तकनीकी स्टाफ की जरूरत पड़ती है। - डॉ. रवि खन्ना, बाल रोग विशेषज्ञ
प्रीमैच्योर बच्चों को ऑक्सीजन, न्यूट्रिशियन और गर्माहट की जरूरत पड़ती है जो उन्हें कृत्रिम रूप से दिया जाता है। इसके लिए पर्याप्त मशीनें होना जरूरी है। कीटाणुओं से बचाना भी एक चुनौती है। एपेक्सिया जैसी बीमारी में भी बच्चों की जान का खतरा बना रहता है। -डॉ. राजेश अग्रवाल, बाल रोग विशेषज्ञ
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क्यारा ब्लॉक के सिमरा बोरीपुर गांव निवासी अमित सिंह की पत्नी अंजलि को बुधवार सुबह सात बजे क्यारा सीएचसी पर बेटा पैदा हुआ। बच्चे की सांस ठीक से नहीं चल रही थी तो सलाह दी गई कि उसे जिला अस्पताल की एनआईसी में भर्ती कर ऑक्सीजन लगवा दी जाए तो ठीक हो जाएगा। अमित ने बताया कि सुबह आठ बजे वह बच्चे को लेकर यहां आ गए और एनआईसी में भर्ती करा दिया। बताया कि थोड़ी देर बाद डॉ. कर्मेंद्र बच्चे को आक्सीजन लगाकर चले गए। बच्चे की सांस में थोड़ा सुधार दिखा। स्टाफ ने बच्चे को छुआ तक नहीं। तब आशा ने उसे सलाह दी कि यह लोग सौ रुपये मांग रहे हैं। उसने आशा के मार्फत स्टाफ को सौ रुपये भी दिए। बावजूद न तो डॉक्टर बच्चे को देखने आए और न स्टाफ ने सुध ली। रात 11 बजे बच्चे की मौत हो गई। मौत के बाद दंपति जार-जार रो रहे थे। कह रहे थे कि गुरुवार को डीएम से शिकायत करेंगे। इस बारे में ईएमओ डॉ. श्लेष कुमार ने डॉ. कर्मेंद्र के हवाले से बताया कि बच्चे को फेफड़े जनित बीमारी थी। अभिभावकों से पहले ही हायर सेंटर ले जाने को कहा था पर उन्होंने सुना ही नहीं।
वहीं, देर रात ही दूसरे बच्चे की मौत बर्न वार्ड में हुई। बदायूं के कुंवरगांव थाना अंतर्गत गांव अहरुईया निवासी रामबाबू जाटव ने बताया कि उनकी पत्नी संगीता 29 अगस्त को खाना बनाते समय गैस लीक होने से झुलस गई थीं। तीन दिन बदायूं जिला अस्पताल में रखने के बाद यहां बर्न वार्ड में रेफर किया गया। संगीता को गर्भ के नौ महीने पूरे होने की जानकारी सारे स्टाफ को थी। रात आठ बजे संगीता को प्रसव पीड़ा हुई तो उसने बर्न वार्ड के स्टाफ से कहा। स्टाफ ने कहा कि महिला अस्पताल में जानकारी दे दी है, जल्द ही डॉक्टर आ जाएंगी। घंटा भर तक कोई नहीं आया तो वह खुद महिला अस्पताल गए। वहां से आधा घंटा बाद डॉक्टर आईं। तब तक बच्चे का सिर बाहर आ चुका था और उनकी पत्नी की जान पर बन आई थी। किसी तरह डिलीवरी हुई। डॉक्टर ने बताया कि बच्चा मृत पैदा हुआ है। उनका कहना था कि पत्नी को पहले ही महिला अस्पताल में भर्ती कर समय से डिलीवरी की जाती तो बच्चा शायद बच जाता।