बरेली। हर धर्म को सशक्त बनाने में महिलाओं की भूमिका अहम होती है। इस्लाम धर्म के सबसे निर्णायक पलों में पैंगबर मोहम्मद की पत्नी खदीजा और उनकी बेटी फातिमा का अहम योगदान रहा है। खदीजा को तो इस्लाम की पहली नारीवादी महिला कहा जाता है जो अपने समय के रूढ़िवादी समाज से काफी आगे थीं। माह-ए-रमजान के अनुसार नौवें रोजे का दिन उनके विसाल के लिए जाना जाता है।
आलिमा मुफ्ती आयशा अमजदी के अनुसार खदीजा का पहली मुस्लिम महिला बनना हो या पैंगबर के विसाल के बाद उनकी बेटी फातिमा का उनके अनुयायियों के बीच विवाद शांत कराना। ऐसे कई मौके आए जब इन महिलाओं ने अपने दम पर नई कहानी लिखी। पैंगंबर मोहम्मद साहब की पत्नी खदीजा को तो इस्लाम की पहली नारीवादी महिला भी कहा जाता है। वह रूढ़िवादी समाज से काफी आगे थीं।
हजरत मोहम्मद के पैगंबर मोहम्मद बनने तक के सफर में खदीजा की अहम भूमिका रही। कहा जाता है कि जब मोहम्मद साहब के सामने पहली बार फरिश्ते जिब्राइल आए और उन्हें कुरान की शिक्षा दी तो उन पर किसी ने यकीन नहीं किया। खदीजा सबसे मुश्किल वक्त में अपने पति के साथ खड़ी रहीं। खदीजा ने पैगंबर मोहम्मद को कारोबार से अलग पूरी तरह इस्लाम के लिए समर्पित होने के लिए भी प्रोत्साहित किया। खदीजा 619 ईस्वी में बीमार पड़ीं उसी बीमारी में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। संवाद