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लॉकडाउन में सुधरे पर्यावरण को संभालना अब सबकी जिम्मेदारी

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बरेली में दिखते पहाड़। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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पर्यावरणविद् चिंतित: हवा, पानी, आसमान पर फिर जमने लगी है धूल की परत
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महज 15 दिनों में 40 से 70 एक्यूआई तक पहुंच चुका है हवा में प्रदूषण का स्तर

बरेली। लॉकडाउन लोगों की कोरोना संक्रमण से हिफाजत के लिए लागू किया गया लेकिन उसने दो महीने में ही सालों से बिगड़े पर्यावरण को भी एक बार फिर सहेज लिया। बेकाबू हुआ प्रदूषण 30 सालों के सबसे निचले स्तर पर आ गया। हवा और पानी के साथ आसमान भी इस कदर साफ हो गया कि लोगों को बरेली में बैठे-बैठे उत्तराखंड के पहाड़ों के दर्शन होने लगे। रामगंगा का पानी आचमन के लायक हो गया, हवा में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी तो लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ गई। मगर अनलॉक-1 के चंद दिन गुजरने के बाद ही पर्यावरण प्रेमियों को एक बार फिर चिंता ने घेरना शुरू कर दिया है। शहर का ट्रैफिक अभी पूरी तरह अपनी पुरानी रौ में नहीं आया है लेकिन इतने में ही प्रदूषण का स्तर फिर बढ़ने लगा है।
बरेली कॉलेज के एमिरेट प्रोफेसर डॉ. डीके सक्सेना के मुताबिक, पर्यावरण को सुधारने के लिए लॉकडाउन कोई विकल्प नहीं है। लॉकडाउन सिर्फ लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए लिया गया आकस्मिक निर्णय है। इसके अप्रत्याशित लाभ दिखाई दिए। एक ओर प्रदूषण के स्तर में करीब 30 सालों बाद अविश्वसनीय गिरावट दर्ज की गई तो दूसरी ओर, लोगों को भी कम संसाधनों में बेहतर जिंदगी जीने का सलीका सीखने को मिला। पर्यावरण बचाने के लिए तो लॉकडाउन नहीं किया जा सकता, लेकिन लोगों को अपनी गलत आदतों को लॉकडाउन करने की जरूरत है। ताकि पर्यावरण की सेहत और देश की इकोनॉमी दोनों पर ही प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
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उन्होंने कहा कि दो माह तक लोग बाहर की चीजों से दूर रहे। घर में बने शुद्ध पकवान का ही सेवन किया। इसके अलाव बाजार की फिजूलखर्ची भी कम रही। लिहाजा, जगह-जगह लगने वाले कचरे से भी शहर मुक्त रहा। ध्वनि प्रदूषण न होने से गौरैया और अन्य कई तरह के पक्षी भी शहर में दिखाई दिए जो सालों पहले ग्रामीण इलाकों की ओर पलायन कर चुके थे। वाहनों के पहिए थमने से धूल और कॉर्बन आदि की कमी के चलते पीएम 10 और पीएम 2.5 भी कम हुआ और बरेली से उत्तराखंड के पहाड़ दिखाई देने लगे।

कचरे में फेंक रहे मास्क, बढ़ रहा बायो मेडिकल वेस्ट

प्रगतिशील किसान और बर्ड वॉचर अनिल साहनी ने कोरोना संक्रमण से बचने के लिए प्रयोग किए जा रहे मास्क आदि को कचरे में फेंके जाने पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि संक्रमण से बचने के लिए लोग मास्क का प्रयोग कर रहे हैं। मगर इसके उचित निस्तारण को लेकर लापरवाह हैं। लिहाजा, कचरे में बायो मेडिकल वेस्ट बढ़ रहा है। लॉकडाउन के दौरान हवा, पानी भले ही शुद्ध हुआ हो लेकिन इस दौरान पैक्ड फूड का खूब उपयोग हुआ। निगरानी न होने की वजह से पॉलीथिन की मात्रा भी बढ़ी।

सिर्फ पेड़ लगाने से ही नहीं होगी पर्यावरण की रक्षा

प्रगतिशील किसान और वरिष्ठ होम्योपैथी चिकित्सक डॉ. विकास वर्मा का कहना है कि पर्यावरण को सहेजने के लिए पेड़ों को लगाने पर लोग ज्यादा जोर दे रहे हैं, जबकि पेड़ लगाने के बाद वह सुरक्षित है कि नहीं इस पर ध्यान नहीं देते हैं। इसके अलावा पेड़ लगाने से ही पर्यावरण संरक्षण हो जाएगा यह मानना गलत है। पर्यावरण का अर्थ है मृदा, वायु और जल का शुद्ध होना। मृदा को सुरक्षित रखने के लिए जैविक खेती की ओर लोगों को ध्यान देना होगा। केमिकल के प्रयोग से मृदा का क्षय होता है और जैव विविधता प्रभावित होती है। हवा शुद्ध रखने के लिए वाहनों का उपयोग कम करें। पानी के बचाव के लिए लोगों को आरओ और एसी से निकले पानी को बचाना सीखना होगा। गाड़ियों को धोने, डेयरियों की गंदगी साफ करने में पानी की बरबादी रोकनी होगी।

विशेषज्ञों के अनुसार पर्यावरण संरक्षण के लिए करें ये उपाय

- पॉलीथिन और थर्माकोल से बने सामान का प्रयोग बंद करें।
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- हफ्ते में एक दिन अपने लिए लॉकडाउन का नियम बना लें।
- आरओ, एसी और वाशिंग मशीन के पानी का प्रयोग करें।
- वाहनों का प्रयोग कम से कम करने की आदत बना लें।
- बगैर ट्रीटमेंट के केमिकल नदी में प्रवाहित करना बंद करें।
- कृषि में केमिकल का प्रयोग कम हो, जैविक खाद प्रयोग करें।
- बायो मेडिकल और ई कचरे का समुचित निस्तारण हो।
- निर्माण सामग्री का एनजीटी के तहत देखभाल की जाए।
- पेड़ों का कटान कम से कम हो और नए पौधे लगाए जाएं।
- पुष्प गुच्छ भेंट करने के बजाय पौधे भेंट किए जाएं।
- निर्माण कार्य मेें कम से कम पेड़ कटे और ज्यादा लगें।

पानी का यूं करें संरक्षण

ब्रश करते समय नल खुला न छोड़ें। शॉवर के बजाय बाल्टी के पानी से नहाएं। गाड़ियां धोने के बजाए बाल्टी में पानी लेकर कपड़े से साफ करें। आंगन व फर्श धोने के बजाए झाडू के बाद पोंछा लगाकर साफ करें। पौंछे का फिनाइल रहित पानी और दाल, सब्जी, चावल धोने के बाद इकट्ठा- कर पानी गमलों व क्यारियों में डालें। सार्वजनिक नलों को बहते देखें तो नल बंद करें। पानी की टंकी बहने न दें और अन्य एहतियात बरतें।

बिजली की बचत करें

ऑफिस हो या घर कमरे से बाहर निकलते लाइट, पंखें बंद करें। एक ही कमरे में एसी, टीवी इत्यादि चलाएं। एसी, फ्रिज में जहरीली गैसे प्रयुक्त न हों इसका ध्यान रखें व ऐसे ही उपकरण करीदने का आग्रह करें जो पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाए। सड़कों पर देर तक जलने वाली लाइट्स बंद करें या करवाएं। विद्युत उपकरणों का समय से रखरखाव करें।

पेट्रोल की बचत भी जरूरी

यह प्राकृतिक संपदा महंगी भी है और इसके पुन: उत्पादन की प्रक्रिया लंबी है, इसलिए इसका किफायती उपयोग करें। संभव हो तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करें। एक ही दिशा में रहने वाले कर्मचारी एक साथ दफ्तर आएं-जाएं। देर तक रुकना पड़े तो इंजन बंद करें। गाड़ी की सर्विसिंग समय पर कराके वातावरण को प्रदूषित होने से बचाएं।

पौधों और पक्षियों का संरक्षण

पृथ्वी पर सिर्फ मनुष्य का ही नहीं मूक पशु-पक्षियों का भी अधिकार है इसलिए उनके आवास स्थलों पेड़-पौधों को नष्ट न करें। दाना-पानी का इंतजाम कर थोड़ी सहृदयता दिखाएं। बाल्टी में गाय, बकरी, कुत्ते आदि के लिए और कटोरे में पक्षियों के लिए पानी का इंतजाम करें। गाय, कुत्ते को रोटी दें पर पॉलीथीन समेत खाना न फेंके, उनकी जान जा सकती है। घर का कचरा सब्जी, फल, अनाज को पशुओं को खिलाएं। सब्जी और सामान के लिए कपड़े की थैलियां गाड़ी में साथ रखें।

सबसे ज्यादा जरूरत नई पीढ़ी को प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के बारे में जानकारी देना है। पृथ्वी हरी भरी होगी तो पर्यावरण स्वस्थ होगा हवा और पानी की प्रचुरता से जीवन सही अर्थों में समृद्ध और सुखद होगा। लॉक डाउन पर्यावरण संरक्षित करने का विकल्प नहीं है लोगों को अपनी बुरी आदतों को लॉक और अच्छी आदतों को अनलॉक करना चाहिए। - डॉ. डीके सक्सेना, एमिरेट प्रोफेसर, बॉटनी विभाग, बरेली कॉलेज

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