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वन विभाग की नर्सरियां जंगली पौधों से गुलजार, प्रकृति प्रेमी लगा रहे दूसरे जिलों की दौड़

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बरेली। एक ओर मानसून शुरू होते ही समाजसेवी, एनजीओ, किसान हो या शहरवासी सभी पौधे लगाने के लिए तत्पर हैं तो वन विभाग उन्हें मनमुताबिक प्रजाति के पौधे ही उपलब्ध कराने में असमर्थ है, जिसके चलते पौधरोपण के शौकीनों को बरेली के अलावा प्रदेश के अन्य जिलों और प्रदेशों की दौड़ लगानी पड़ रही है। फलदार, औषधीय, छायादार और फूलदार पौधे के बजाय वन विभाग की नर्सरी ‘जंगली पौधों’ से गुलजार है। मानसून में पौधरोपण का लक्ष्य पूरा करने के लिए मुफ्त पौधे देने की घोषणा के बावजूद मनचाहा पौधा न मिलने से वन विभाग शहरवासियों और बड़े कास्तकारों को नहीं लुभा पा रहा है।
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जिले में वन विभाग की 29 नर्सरी हैं। जहां सागौन, यूकेलिप्टस, पॉपुलर, शीशम, बबूल, जामुन, कैथ, इमली समेत अन्य जंगली प्रजातियों के पौधे तो बहुतायत में हैं, लेकिन फलदार पौधे आम, लीची, चीकू, कीनू, आंवला, मौसमी, संतरा, अमरूद, अंगूर या अन्य पौधे की संख्या बेहद कम है। संख्या के साथ ही इन पौधों की बेहतर किस्म की प्रजातियों की भी कमी है। शहरवासी बेहतर प्रजाति के पौधे लेने वन विभाग की नर्सरी पहुंचते हैं तो उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। नर्सरी के बाहर लगे बोर्ड पर भी जितने पौधों के नाम दर्ज होते हैं वे भी नहीं मिलते। इससे वन विभाग की नर्सरी की ओर रुख करने के बजाय लोग अन्य जिले व प्रदेश के चक्कर काट रहे हैं।
घरों में कोई नहीं लगाता जंगली पौधे
प्रगतिशील किसान अनिल साहनी के मुताबिक वन विभाग की इस खामी से लोगों का समय और धन दोनों की ही बरबादी हो रही है। मनचाहे पौधे लेने के लिए लोगों को उत्तराखंड, मुजफ्फरपुर, सहारनपुर, मलिहाबाद, गढ़मुक्तेश्वर, हिसार तक की दौड़ लगानी पड़ रही है। कहा, वन विभाग की नर्सरी में जो पौधे हैं वे जंगली हैं, लोग घरों में इन पौधों को लगाने से परहेज करते हैं। अगर वन विभाग पर्यावरण को संजोना चाहता है तो उसे फलदार, फूलदार और बेहतर प्रजाति के छायादार पौधों को नर्सरी में उपलब्ध कराना होगा।
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लाखों की संख्या में लगेंगे यूकेलिप्टस
वन विभाग पौधरोपण अभियान के तहत 80 फीसदी इन्हीं जंगली पौधों को रोपने की तैयारी में है। इसमें सर्वाधिक यूकेलिप्टस के करीब 20 लाख पौधे रोपे जाएंगे, जिसके बाद सागौन के पौधे लगाए जाएंगे। वन विभाग के डीएफओ भरत लाल के मुताबिक किसानों ने इन्हीं पौधों की मांग की है इसलिए उन्हें ये पौधे उपलब्ध कराए जा रहे हैं। वन विभाग के इस निर्णय को पौधों के विशेषज्ञों ने सिरे से नकारा है। डॉ. विकास वर्मा का कहना है कि बड़ी संख्या में लगने वाले यूकेलिप्टस के पौधे जमीन से काफी मात्रा में पानी अवशोषित करेंगे। वहीं ये पौधे 7 से 10 साल में काट लिए जाते हैं, ऐसे में ये पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी बेहतर नहीं हैं।
यूकेलिप्टस रोजाना अवशोषित
करता है 24 गैलन पानी
बरेली कॉलेज बॉटनी विभाग के डॉ. आलोक खरे ने बताया कि यूकेलिप्टस प्रतिदिन 24 गैलन पानी अवशोषित करता है। जड़ें काफी गहराई में होने से जमीन के काफी नीचे से पानी खींच लेता है। मिट्टी में मौजूद तमाम पोषक तत्वों भी खींच लेता है। इससेेे मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित होने खेत बंजर होने लगते हैं। पेड़ की जड़ के समीप घास नहीं उगती। कहा, प्रतिकूल प्रभाव से वंचित किसान धड़ल्ले से रोपण कर माटी का सत्यानाश कर रहे हैं। उन्होंने यूकेलिप्टस के स्थान हाइब्रिड सागौन, सेमल को रोपने की सलाह दी है।
वन विभाग वृक्षारोपण के लिए उपयोगी पौधों की नर्सरी तैयार करता है। विभिन्न प्रजातियों के पौधे रख पाना नामुमकिन है। यूकेलिप्टस के पौधे किसानों ने ही मांगे हैं, इसलिए उन्हें ये पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे। यूकेलिप्टस का पौधा पानी सोखकर खेत को बंजर बनाता है, यह गलत है।
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- आरबी सिंह, एसडीओ, वन विभाग
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