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अपने दम पर खेल निखार रहीं लड़कियां

Thu, 23 Nov 2017 02:12 AM IST
बरेली।
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‌िख्‍ाखिलाड़ी
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वीरांगना रानी अवंती बाई महिला महाविद्यालय के मैदान पर सोमवार को सौ मीटर दौड़ में लड़कियां नंगे पैर ही मैदान पर दौड़ीं। इस दौरान इन खिलाड़ियों के चेहरे पर शिकन तक नहीं दिखी। इनका उत्साह यह बताने के लिए काफी था कि उनके अंदर खेल की कितनी संभावनाएं मौजूद हैं। हालांकि, असलियत यह है कि इन खिलाड़ियों के अंदर खेल की क्षमता उन्हें जरूरी प्रशिक्षण और संसाधन न मिलने के कारण कमजोर पड़ रही है। कई खिलाड़ी अपने स्तर पर जूझ रहे हैं कि व्यवस्था की लापरवाही के कारण कहीं उनके अंदर का खेल खत्म न हो जाए। ऐसी ही कुछ लड़कियों की है ये कहानी। 

चक्का फेंक खिलाड़ी की प्रतिभा दब गई 
भारत सेवक समाज स्कूल, रजपुरी नवादा की ओर से चक्का फेंक खेलकर मंडल स्तर की खिलाड़ी बनीं ऊषा देवी की खेल प्रतिभा अवंती बाई कॉलेज आने के बाद दब गई है। हालांकि, कॉलेज में हुई खेलकूद प्रतियोगिता में उन्होंने हिस्सा लिया और जीतीं भी। वह कहती हैं कि अब खेल की तैयारी के लिए उन्हें स्कूल जैसा माहौल और प्रशिक्षण नहीं मिल रहा है। उन्होंने विश्वविद्यालय स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लिया था पर उससे पहले भी कोई तैयारी नहीं कराई गई थी। 
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अपने दम पर आज भी खेल रहीं क्रिकेट 
मीरानपुर कटरा (शहाजहांपुर) की पल्लवी शर्मा स्कूल स्तर पर प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिताओं में अपने प्रदर्शन के बल पर बेहतरीन ऑल राउंडर बनकर उभरीं। अब बरेली कॉलेज में पढ़ रही इस खिलाड़ी को आवश्यक प्रशिक्षण नहीं मिल रहा है। आलम यह है कि अंतर विश्वविद्यालयीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए इस खिलाड़ी समेत पूरी टीम को कालेज में प्रैक्टिस नहीं करने दी गई। पल्लवी बताती हैं कि उन्होंने प्राइवेट कोच से ट्रेनिंग ली। दूसरी ओर कॉलेज वालों ने खिलाड़ी का इस्तेमाल करने के लिए उसे खो-खो के ट्रायल मैच में भी शामिल कर लिया। 18 नवंबर को अंबाला में हुए मैच में उन्होंने नाबाद पारी खेली और दो विकेट लेकर मैच जिताया था। 
खुद मेहनत करके विश्वविद्यालय का नाम कर रहीं रोशन 
जेबीएस इंटर कालेज से इंटर करने वालीं अंजलि लाल वर्ष  2013 में दो सौ मीटर दौड़ मेें प्रदेश स्तर पर गोल्ड लाईं। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभाग किया। वह बताती हैं कि आर्य कन्या महाविद्यालय में मैदान नहीं है, इसलिए वर्कआउट खुद से ही स्टेडियम में करती हैं। स्टेडियम में एक साल से कोच न होने से उनकी परेशानी बढ़ गई है। जिसके बाद कालेज की ओर से खेलती हैं। उन्होंने इस बार विश्वविद्यालय में हुई जोनल एथलेटिक्स में चार सौ मीटर दौड़ में गोल्ड, दो सौ दौड़ में सिल्वर लाईं। क्रास कंट्री में ब्रांज मेडल लाने के बाद उन्होंने ऑल इंडिया लेवल पर भी भाग लिया। जिसमें उनकी रैंक दो सौ रही।  


नेशनल हैंडबॉल प्लेयर को ऑल राउंडर बना डाला 
2009 से हैंडबॉल खेल रहीं मोनिका सिंह चौहान अपने बूते पर लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। उन्होंने वर्ष 2014 में केपीआरसी की ओर से स्कूल नेशनल खेला। वर्ष 2015 से बरेली कॉलेज से बीए कर रहीं मोनिका यहां के लिए अपना तीसरा इंटर यूनिवर्सिटी खेल रही हैं। वह कहती हैं कि कॉलेज में कोच नहीं है। जो कुछ सीखा वह स्टेडियम में प्रैक्टिस कर ही सीखा है। कॉलेज में तो बस मैच से पहले नोटिस बोर्ड लग जाता है या टीचर आकर बता जाते हैं कि ट्रायल के लिए नाम लिखवा लेना। वह बताती हैं कि अब तक कॉलेज की ओर से वह लगभग सभी खेलों में भाग ले चुकी हैं। इसमें फुटबॉल, बास्केट बॉल, सॉफ्ट बॉल (ऑल इंडिया लेवल) और थ्री बॉल (नेशनल लेवल) मुख्य हैं। 


काजल ने बचाई विश्वविद्यालय की नाक 
काजल एक ऐसी खिलाड़ी हैं, जिनकी प्रगति में उनका शिक्षण संस्थान कोई सहायता तो नहीं कर रहा पर उनकी सफलता के जरिए अपनी नाक जरूर बचा रहा है। बीते दिनों विश्वविद्यालय में जोनल प्रतियोगिता में टीमें लगातार हार रहीं थी तो काजल आठ सौ मीटर दौड़ में रजत पदक लाईं थीं। थाना रिठौरा के लाड़पुर गांव की यह लड़की चार साल से प्रैक्टिस कर रही है। काजल बताती हैं कि एक समय ऐसा भी था जब गांव की कच्ची सड़क पर उनके दौड़ने से गांववालों को ऐतराज था। उनके माता-पिता ने लगातार उनका हौसला बढ़ाया। दरबारी लाल इंटर कॉलेज से स्कूली पढ़ाई के दौरान उन्होंने स्टेट रिले में रजत पदक जीता। कॉलेज पहुंचीं तो उम्मीद थी कि माहौल बदलेगा पर आर्य कन्या महाविद्यालय में दाखिला लेने के बाद भी उन्हें कोई सहूलियत नहीं मिली। भले ही वह कॉलेज की ओर से खेलती हैं पर इसकी तैयारी वह प्राइवेट कोच से प्रशिक्षण लेकर ही कर रही हैं। 
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स्पोर्ट्स पर ध्यान नहीं देते कॉलेज 
महाविद्यालय अपने यहां होने वाली खेलकूद प्रतियोगिताओं में मात्र कोरम पूरा कराते हैं। एडमिशन के समय 150 रुपये वार्षिक के हिसाब से क्रीड़ा शुल्क लिया जाता है, जिसका किसी स्तर पर इस्तेमाल नहीं होता। कॉलेजों में न तो टीम बनाकर सालभर प्रैक्टिस कराई जाती है, न ही उन्हें कोई यूनिफॉर्म उपलब्ध कराई जाती है, जबकि इसका अलग से मद है। हाल ही में अवंतीबाई में खेलकूद प्रतियोगिता के दौरान देखने को मिला कि यहां किसी भी खेल में टीम बनाकर प्रैक्टिस नहीं कराई गई थी। ज्यादातर खिलाड़ियों ने स्पॉट एंट्री कराई। बरेली कॉलेज के खिलाड़ी कई बार शिकायत कर चुके हैं कि खेल में पंजीकरण कराने के बाद भी उन्हें ट्रैक सूट नहीं दिया गया। 
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