बरेली। बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाले रक्त रोग को थैलेसीमिया कहते हैं। अगर वर-वधू समय रहते एचपीएलसी (हाई प्रोफाइल लिक्विड क्रोमैटोग्राफी) की जांच कराएं तो अगली पीढ़ी को सुरक्षित किया जा सकता है।
बरेली थैलेसीमिया सोसायटी की संरक्षक डॉ. जलबाला सरदाना के मुताबिक मंडल में थैलेसीमिया ग्रसित बच्चों की तादाद बढ़ती जा रही है। उनको बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। आर्थिक रूप से संपन्न अभिभावक इसका खर्च वहन कर लेते हैं, लेकिन गरीब अभिभावक बच्चे का इलाज नहीं करा पाते। शादी से पहले ही लड़का-लड़की के खून की जांच हो जाए तो इस रोग को खत्म किया जा सकता है।
शादी से पूर्व लड़का और लड़की को एचपीएलसी टेस्ट करवाना चाहिए। एचपीएलसी टेस्ट से एचबीएटू (हीमोग्लोबिन ए2) की जांच होती है। अगर जांच में लड़का-लड़की के खून में एचबीएटू 3.8 तक है, तो कोई दिक्कत नहीं। इससे अधिक होने पर थैलेसीमिया माइनर का मामला हो सकता है। करीब छह सौ रुपये में निजी लैब पर एचपीएलसी टेस्ट हो जाते हैं।
बच्चों को हो सकती है अधिक परेशानीडॉ. सरदाना के मुताबिक अगर अभिभावक में थैलेसीमिया माइनर है तो बच्चे को मेजर थैलेसीमिया की आशंका रहती है। ऐसे में थैलेसीमिया माइनर से पीड़ित लड़का-लड़की को शादी से बचना चाहिए। दूसरा विकल्प शादी के बाद विवाहिता के गर्भवती होने पर खून की जांच का है। उस दौरान अगर जांच में बच्चे के थैलेसीमिया से पीड़ित होने का पता चले तो डॉक्टर के अनुसार आगे इलाज करवाना चाहिए।
दवा-खून की उपलब्धता होती है प्रभावित
जिला अस्पताल में थैलेसीमिया पीड़ित मरीजों का निशुल्क उपचार होता है, मगर ब्लड बैंक में संबंधित ग्रुप का खून उपलब्ध न होने से पीड़ित को जान का जोखिम होता है। वहीं, दवाएं भी अक्सर कम रहती हैं।
क्या है थैलेसीमिया
थैलेसीमिया पीड़ित होने पर हीमोग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इससे रक्त की कमी हो जाती है। इसकी पहचान बच्चे की आयु तीन माह पूरी होने के बाद होती है।