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करोड़ों की जमीनों की फाइलें तहसील से गायब कबाड़ी के पास ‘मिली’ जब गुस्साए साहब

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बरेली। कभी खतौनी में जालसाजी और कभी रजिस्ट्री में गड़बड़ी करके कीमती जमीनें कब्जाने के मामले लगातार सामने आने के बावजूद अफसर राजस्व विभाग के स्टाफ को भूमाफिया के इशारे पर नाचने से रोक नहीं पा रहे हैं। अब सदर तहसील से बेशकीमती जमीनों की सात फाइलें गायब होने के मामला चर्चा में है। पूर्व डीएम वीरेंद्र कुमार सिंह ने अपने ट्रांसफर से दो दिन पहले इस मामले में एफआईआर कराने का आदेश दिया तो तहसील का बाबू छह फाइलें एक कबाड़ी के यहां से ढूंढ लाया। एक फाइल अब भी गायब है, हालांकि इसके बावजूद तहसील के अफसरों ने यह जांच कराने की जरूरत नहीं समझी कि फाइलें तहसील से कबाड़ी की दुकान पर कैसे पहुंच गईं।
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राजस्व विभाग में भूमाफिया की हद से ज्यादा घुसपैठ की वजह से कीमती जमीनें लगातार असुरक्षित होती जा रही हैं। करोड़ों की जमीनों की सात फाइलें गायब होने का मामला तब चर्चा में आया जब 14 ्अक्तूबर को तहसीलदार सदर के न्यायालय में सुनवाई के लिए इन फाइलों को तलाश किया गया। फाइलें न्यायालय में नहीं मिलीं तो तहसीलदार के पेशकार विक्रम सिंह ने उन्हें तहसील के और सभी न्यायिक पटलों और कार्यालयों में तलाश करने के साथ स्टाफ से भी पूछताछ की लेकिन फाइलें कहीं नहीं मिलीं। कई दिन बाद पेशकार ने इसकी लिखित जानकारी तहसीलदार सदर को दी। इसके बाद मामला एसडीएम और फिर डीएम कार्यालय तक पहुंचा जिस पर तत्कालीन डीएम वीरेंद्र कुमार सिंह ने इस मामले में तहसीलदार को एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दे दिया।
डीएम के आदेश से तहसील में खलबली मच गई। तहसीलदार ने एफआईआर तो नहीं दर्ज कराई लेकिन इसके फौरन बाद बेहद नाटकीय ढंग से बताया गया कि गायब हुईं फाइलें करगैना गांव में कबाड़ी के पास हैं। कथित रूप से यह सूचना मिलने के बाद तुरंत मौके पर पहुंचे तहसील के स्टाफ ने कबाड़ी से संपर्क किया तो वहां छह फाइलें मिल गईं जिन्हें कब्जे में ले लिया गया। सातवीं फाइल जो ग्राम सभा सफरी बनाम उस्मान रजा मुकदमे से संबंधित थी, वह नहीं मिल पाई।
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कैसा इत्तफाक.. जो बाबू था जिम्मेदार उसी के पास आया कबाड़ी का फोन
कैसे गायब हुईं फाइलें, कोई जांच नहीं
बेशकीमतों जमीनों को लेकर किस हद तक बेखौफ ढंग से खेल किया जा रहा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपनी गर्दन बचाने के लिए कोई भी मनगढ़ंत कहानी पेश कर दी जा रही है और अफसर उसकी तस्दीक के बगैर ही यकीन भी कर ले रहे हैं। बताया जा रहा है कि जब डीएम ने फाइलें गायब होने के मामले में एफआईआर का आदेश दिया, उसके अगले ही दिन फाइलें रखने के जिम्मेदार बाबू के पास कबाड़ी का सीधा फोन आया कि तहसील की कुछ फाइलें उसके पास पड़ी हुई हैं। इसके बाद वहां जाकर फाइलें अपने कब्जे में ले ली गईं। इसके बाद अफसरों ने इसकी जांच कराने की कोई जरूरत नहीं समझी कि दो सप्ताह तक तहसील सदर कार्यालय से गायब रहीं करोड़ों रुपये की जमीनों की फाइलें पांच किलोमीटर दूर किसी कबाड़ी के पास कैसे पहुंच गईं। पूरा घटनाक्रम फिल्मी कहानी जैसा होने के बावजूद कोई छानबीन नहीं की गई। उस कबाड़ी से भी कोई पूछताछ नहीं की गई जिसके पास फाइलें मिलीं। तहसीलदार और एसडीएम सदर दोनों कार्यालयों ने चुप्पी साध ली।

तहसील और राजस्व रिकार्ड से गायब हैं तमाम फाइलें
कलेक्ट्रेट और तहसील स्थित राजस्व रिकार्ड रूम और कार्यालयों से बड़ी तादाद में जमीनों से जुड़ी फाइलें गायब हैं। इससे जुड़े लोग बाबू और कार्यालयों का चक्कर लगाते थक चुके हैं। दर्जनों मामलों में भू-माफिया और रिकार्ड में गड़बड़ी करने वाले चिह्नित हुए, लेकिन मनमाने सिस्टम में उनका आज तक कुछ नहीं हुआ।

ग्राम सभा की जमीनों पर अवैध कब्जों की हैं ज्यादातर फाइलें
तहसीलदार के न्यायालय से जो फाइलें गायब हुईं, उनमें ज्यादातर ग्राम सभाओं की बेशकीमती जमीनों पर अवैध कब्जे से जुड़ी हुई हैं। इनमें कई मामले दाखिल-खारिज और एकाध अवैध कब्जे से जुड़ा हुआ है। तहसीलदार सदर की ओर से 30 अक्टूबर को डीएम कार्यालय को भेजी अपनी आख्या में जिन गायब फाइलों का ब्योरा दिया है, उस सूची के मुताबिक धारा 34/35 से संबंधित गांव सभा बनाम शमशीरा बडिया, सरला कुमारी बनाम राकेश कुमार हरूनगला, विष्णु कुमार बनाम अंगन सैदपुर हाकिन्स, विद्यावती डेवलपमेंट बनाम भगवान दास मुंड़िया, हरीओम बनाम दामोदर ग्राम गोपालपुर नगरिया, धारा 35(1) रूपेश कुमार बनाम भगवती प्रसाद ग्राम टंडवा और धारा 67 यानी कब्जा प्रकरण गांव सभा बनाम उस्मान रजा ग्राम सफरी का है। इनमें कब्जा प्रकरण की गांव सभा बनाम उस्मान रजा ग्राम सफरी की फाइल अब भी गायब बताई जा रही है।

अफसर लटका देते हैं जालसाजी के मामले.. खुद ही रखें ख्याल
नवाबगंज में सौ बीघा जमीन पर कब्जे का मामला सस्ते में निपटाया
बरेली। भूमाफिया और राजस्व स्टाफ की सांठगांठ इस हद तक पहुंच चुकी है कि कब किसकी जमीन की मिल्कियत किसी और के नाम दर्ज हो जाए कुछ पता नहीं। जिले में कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं लेकिन अफसरों ने इन मामलों में इस कदर ढिलाई दिखाई कि यह सिलसिला बंद होने के बजाय और तेज हो गया।
नवाबगंज के गांव अटंगा चांदपुर के अबरार हुसैन की डंडिया नजमुल निशा में करीब सौ बीघा जमीन को खतौनी में जालसाजी करके उसे तारिक नाम के एक शख्स की मिल्कियत दिखा दी गई थी। जमीन का अमल दरामद भी करा दिया गया। शिकायत पर तत्कालीन एडीएम सिटी ओपी वर्मा ने तत्कालीन एसीएम फर्स्ट जलालुद्दीन से जांच कराई तो पता चला कि 2005 में चकबंदी कोर्ट में अबरार की जमीन की खतौनी पर हापुड़ के तारिक का नाम दर्ज कर दाखिल खारिज कर दिया गया। 2014 में उप संचालक चकबंदी रमाकांत शुक्ला ने इसे खारिज करने के आदेश दिए तो आरोपियों ने 2016 में व्हाइटनर लगाकर उनका आदेश तक पलट दिया। एडीएम सिटी की जांच में आखिरकार तारिक के बेटे फिरोज की जालसाजी का भंडाफोड़ हो ही गया। डीएम के आदेश पर दो खरीदारों के साथ राजस्व निरीक्षक और पांच सरकारी कर्मचारियों पर भी एफआईआर हुई लेकिन इन कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई का मामला अब तक ठंडा पड़ा हुआ है।
इस गंभीर घोटाले में सिर्फ चकबंदी के अहलमद रमोद सक्सेना और मकीरूद्दीन के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई हुई है मगर दूसरे आरोपी राजस्व अभिलेखागार के नकल नवीस रकिमुल हसनैन, परगना अरेंजर राम मनोहर सक्सेना और नवाबगंज तहसील के राजस्व निरीक्षक चोखे सिंह और आरोपी डाक रनर पर विभागीय कार्रवाई तक नहीं हुई।

खतौनी खुरचकर कब्जाई सैकड़ों बीघा जमीनें अब तक हाथ नहीं आई
बरेली। खतौनियों को खुरचकर अरबों की जमीन हड़पने के मामले में आरोपियों पर कोई कार्रवाई न किए जाने की शिकायत मिलने के बाद इस घोटाले की फाइल शासन ने फिर खुलवा दी है। हाल ही में शासन के उप सचिव गिरीश चंद्र ने डीएम को विभागीय जांच कराकर रिपोर्ट देने के निर्देश दिये है।
फरीदपुर और फतेहगंज पूर्वी में सैकड़ों बीघा जमीन के रिकॉर्ड में जालसाजी करने के मामले में नवाबगंज में तैनात रहे एसडीएम अरुणमणि तिवारी ने सात लोगों के खिलाफ 13 अक्तूबर 2017 को कोतवाली बरेली में मुकदमा दर्ज कराया था। इनमें वाहिद बेग, ताहिर बेग, फैयाज बेग, मोहम्मद बेग और आसिफ बेग शामिल थे जो फतेहगंज पूर्वी के ही निवासी थे। भूमाफिया के साथ मिलकर खतौनियों में हेराफेरी करने वाले बाबुओं में राजेंद्रनगर निवासी विनोद कुमार सक्सेना और सुभाषनगर में बालाजी मंदिर के पीछे रहने वाली शैली जौहरी सेवानिवृत्त हो चुके हैं जबकि ऊषा जयंत नवाबगंज तहसील में अब भी तैनात हैं। रिकॉर्ड रूम का रखरखाव कर्मचारी ममता सक्सेना की देखरेख में होता था जिनकी अब मौत हो चुकी है। उनके खिलाफ जांच हो चुकी है और उसमें वह निर्दोष साबित हुई थीं।
इसी साल एक जुलाई को फतेहगंज पूर्वी के एक व्यक्ति ने शासन को शिकायत भेजी कि इस जमीन घोटाले में खतौनियों में व्हाइटनर लगाकर राजस्व रिकार्डों में गड़बड़ी हुई थी। अभिलेख में कई जगहों पर ब्लेड से खुरचकर उनकी जगह पर फर्जी तरीके से नाम दर्ज कराए थे। अशुद्घ इन रिकार्डों को अब तक ठीक नहीं किया गया है। दोषी बाबुओं पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है। शासन के 16 अक्तूबर के आदेश के बाद डीएम को इस घोटाले की जांच करके रिपोर्ट देनी है। इस मामले की रिपोर्ट अभी प्रशासन ने नही भेजी है।
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दोनों घोटाले गंभीर किस्म के हैं। दोनों मामलों की जानकारी लेकर जो भी कार्रवाई लंबित है, उसे आगे बढ़ाया जाएगा। - नितीश कुमार, डीएम
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