पश्चिम एशिया में युद्ध का असर स्थानीय औद्योगिक ढांचे पर पड़ने लगा है। शुरुआती झटकों में किसी तरह संभले लेकिन अब स्थिति गंभीर हो गई है। एलपीजी की किल्लत, कच्चे माल की सीमित आपूर्ति, मजदूरों की कमी से उत्पादन 60 फीसदी तक प्रभावित हो गया है। कई इकाइयों ने रात की शिफ्ट बंद करनी पड़ रही है। उत्पादों की कीमत भी पांच से दस रुपये तक बढ़ गई है।
उद्यमियों के मुताबिक पैकेजिंग, नमकीन, बेकरी, साबुन, डिटर्जेंट, फर्नीचर और विनियर उद्योगों में उत्पादन खासा प्रभावित है। पहले तीन शिफ्ट में 24 घंटे संचालित होने वाली फैक्टरियां अब दो शिफ्ट में सिमट रही हैं। एक तरफ एलपीजी की किल्लत और दूसरी ओर कच्चा माल न मिलने से उत्पादन चक्र टूट रहा है। गैस की कीमत बढ़ने से मशीनों को लगातार चलाना संभव नहीं रहा। कच्चे माल की डिलीवरी में देरी और उत्पादन लागत बढ़ने का असर पड़ रहा है।
श्रमिक संकट ने हालात को और जटिल बना दिया है। औद्योगिक संगठनों का कहना है कि कम काम और अनिश्चितता के चलते बड़ी संख्या में मजदूर अपने गृह जनपद या अन्य शहरों की ओर रुख कर चुके हैं। इस परिस्थिति में तुरंत कुशल श्रमिकों का मिलना मुश्किल है।
वार्षिक आपूर्ति के करार से कतराने की नौबत
भोजीपुरा औद्योगिक आस्थान के अध्यक्ष और पैकेजिंग इकाई संचालक अजय शुक्ला के मुताबिक, युद्ध से पूर्व कंपनियों से वार्षिक करार किया जाता था, जिसे पूरा कर पाना अब मुमकिन नहीं। प्लास्टिक, इंक, पेपर आदि की उपलब्धता का संकट समेत कीमतों में उछाल जारी है। अगर करार कर लें और बाद में माल उपलब्ध न करा पाएं तो धरोहर राशि भी वापस नहीं मिलेगी। कीमतों में उछाल हुआ तो घाटा भी सहना पड़ेगा।
गैस की किल्लत, अनाज भी महंगा
बेकरी कारोबारी के मुताबिक, पॉलीथिन महंगी हो गई और उपलब्धता भी सीमित है। पैकेजिंग लागत बढ़ी है। उत्पादों को तपाने के लिए प्रयोग हो रही गैस, डीजल भी महंगा हो गया है। गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी करीब ढाई सौ रुपये बढ़ गया और निर्यात को भी मंजूरी मिलने से उपलब्धता भी प्रभावित है। छोटे स्तर पर संचालित रस्क, ब्रेड संबंधी कई फैक्टरियां बंद हो गईं। लिहाजा, कीमत बढ़ानी पड़ रही है।
लैब्सा का संकट, 75% फैक्टरियों में उत्पादन प्रभावित
डिटर्जेंट और साबुन फैक्टरी संचालक तेजेंद्र के मुताबिक, डिटर्जेंट निर्माण में करीब 15 फीसदी लैब्सा का प्रयोग होता है। अब यह मिलना मुश्किल हो रहा है। जिनके पास है, वे तिगुना दाम मांग रहे हैं। पैकेजिंग के लिए प्रयोग होने वाले प्लास्टिक, पॉलिथिन भी नहीं मिल रहे। सिर्फ बड़ी कंपनियों के पास ही काम बचा है। बरेली में डिटर्जेंट की आठ फैक्टरियां हैं। सभी में उत्पादन 75 फीसदी तक प्रभावित है।
मेथनॉल का संकट, प्लाईवुड कारोबार प्रभावित
विनियर और प्लाईवुड कारोबार भी प्रभावित है। एसोसिएशन के अध्यक्ष शेखर अग्रवाल के मुताबिक, प्लाईवुड निर्माण में प्रयोग होने वाला ग्लू तैयार करने में मेथनॉल का प्रयोग होता है। भारत में इसकी आपूर्ति ईरान से होती है। युद्ध के चलते आयात ठप रहा और अब भी असमंजस की स्थिति है। कीमत भी दोगुनी हो गई है। जल्द अड़चन दूर न हुई तो प्लाईवुड कारोबार ठप होने की आशंका है।
बाजार में रहना जरूरी, बंद फैक्टरी को मिली ऊर्जा
कॉमर्शियल एलपीजी न मिलने से बीते दिनों ठप हुई यूनिपैक इंडस्ट्री का संचालन अब शुरू हो गया है। हालांकि, जरूरत के अनुसार गैस न मिलने से उत्पादन सीमित है। संचालक अर्पित गुप्ता के मुताबिक, जिला प्रशासन से गुहार के बाद कॉमर्शियल सिलिंडर मिलने से फैक्टरी में उत्पादन शुरू हो गया है। कारोबार के लिहाज से बाजार से गायब रहना सही नहीं। उत्पादन कम है, पर बाजार में टिके हुए हैं।