दोनों निजी अल्ट्रासाउंड सेंटर पंजीकृत
पीसीपीएनडीटी प्रभारी डॉ. लईक अहमद अंसारी के मुताबिक, दोनों प्रसूताओं ने जिन निजी अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर जांच कराई थी, वे स्वास्थ्य विभाग में पंजीकृत हैं। बताया जाता है कि सेंटरों पर मरीज या गर्भवती की जांच टेक्निकल एक्सपर्ट करते हैं। रेडियोलॉजिस्ट उनकी ओर से तैयार रिपोर्ट पर ही हस्ताक्षर करते हैं। इसलिए भी रिपोर्ट में गड़बड़ी की आशंका रहती है।
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स्टाफ के दर्ज किए बयान सीसी फुटेज भी खंगाले पर नहीं दिखा दूसरा शिशु
भुता के गजनेरा निवासी सुरेश बाबू की पत्नी राजेश्वरी देवी की अल्ट्रासाउंड जांच रिपोर्ट में जुड़वां बच्चे दिखे थे, पर प्रसव एक बच्चे का हुआ था। सीएमएस डॉ. त्रिभुवन प्रसाद के मुताबिक लेबर रूम में कैमरे नहीं लगे हैं। वहां आवाजाही का दूसरा रास्ता भी नहीं है। बरामदे और अस्पताल परिसर में लगे सीसी कैमरों की फुटेज में प्रसव के बाद छह घंटे तक की फुटेज खंगाली गई, पर दूसरा बच्चा नहीं दिखा। बच्चे जन्म के बाद रोते हैं, यहां दूसरे बच्चे के रोने की आवाज भी नहीं आई। स्टाफ और उनकी दादी ने भी एक ही बच्चे को देखने की बात कही है। जांच जारी है।
विशेषज्ञ बोले- जांच के दौरान बच्चे की स्थिति का पड़ता है प्रभाव
विशेषज्ञों के मुताबिक, अल्ट्रासाउंड जांच के दौरान भ्रूण की पोजीशन सही न होने, गर्भवती के पेट में गैस, एम्नियोटिक फ्लूड बेहद कम या अधिक होने, मशीन की गुणवत्ता या सेटिंग ठीक न होने, रेडियोलॉजिस्ट की अनुभव की कमी, बच्चे का मूवमेंट तेज होने, जुड़वां में एक बच्चे के ठीक पीछे दूसरे का होने या उससे सटे होने से रिपोर्ट में दस फीसदी तक त्रुटि की आशंका रहती है।