विहिप नेता डा. प्रवीण तोगड़िया ने खुद को किसान बताते हुए कहा कि जब देश की आबादी 30 करोड़ थी, तब जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 44 फीसदी होती थी। आज जब आबादी सवा अरब है तो जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी घटकर मात्र 14 फीसदी रह गई है। हम शॉपिंग माल, शोरूम, फोरलेन बनाकर भारत को अमेरिका और यूरोप बनाने निकले हैं। अगर यही हाल रहा तो किसानों की ऐसे विकसित भारत में कोई जगह नहीं होगी। स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि देश के अधिकांश किसानों की प्रति माह आमदनी 15 सौ रुपये है जो कि सबसे कम है। विश्व बैंक की कार्यप्रणाली जिस तरह की है। उसमें किसान खेती छोड़कर मजदूरी करने को मजबूर हैं। उत्तराखंड के दौ गांवों में एक भी किसान नहीं है। वे शहरों की झुग्गी झोपड़ी में रहकर मजदूरी करके जीवनयापन कर रहे हैं।
डा. तोगड़िया ने किसानों को समृद्ध बनाने के लिए अपना चार सूत्रीय एक्शन प्लान भी पेश किया।
पहला सूत्र- कम से कम खर्च में खेती
किसान फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए खेतों में फसल के पोषण के लिए यूरिया, डीएपी और पोटाश का इस्तेमाल बंद करें। प्रति एकड़ में दो हजार का खर्च आता है। किसान इसका मुफ्त या 50 और 100 रुपये खर्च कर ये रुपये बचा सकते हैं। फसल का पोषण केवल मिट्टी से नहीं बल्कि सूर्य, हवा और पानी से भी होता है। उन्होंने 10 किलो मिट्टी के गमले में खरबूजा और बेल एक साथ बोया। जब फसल हुई तो दोनों का वजन 9.5 किलोग्राम निकला। मिट्टी का वजन भी 9.80 किलोग्राम था। मतलब, खरबूजा और बेल उगाने में मात्र 20 ग्राम वजन मिट्टी खर्च हुई।
दूसरा सूत्र -खेत की मिट्टी की जांच
मिट्टी को भौतिक, रासायनिक और जैविक स्वास्थ्य की जरूरत होती है। फसल उत्पादन के लिए मिट्टी में 28 तत्व होने चाहिए। 1960 में जब देश में रासायनिक खाद बाजार में आई तो उसने तीन तत्व बढ़ा दिए जिससे तुरंत फसलों का उत्पादन बढ़ गया। इसके बाद रासायनिक खादों ने मिट्टी में से 26 तत्व सोखने शुरू कर दिए। किसान 400 रुपये की यूरिया एकड़ खेत में डालते हैं तो उसमें 20 किलो यूरिया का नाइट्रोजन बनकर हवा में उड़ जाता है। फसल को बहुत कम नाइट्रोजन मिलता है। इससे अब फसलों का उत्पादन नहीं बढ़ रहा।
एक ग्राम मिट्टी में 10 करोड़ सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं जो फसलों को मौसम के हिसाब से पोषण देते हैं। राइजोबियम, एजोवेक्टर, एसीटो और ग्रीन अलगी नामक वेक्टीरिया फसल को 28 तत्वों का पोषण देते हैं। रासायनिक खादों के इस्तेमाल करने से खेतों में अब इन वेक्टीरिया की संख्या घटकर 10 हजार से भी कम रह गई है। मिट्टी की जांच किसानों की समृद्धि का पहला रास्ता है।
तीसरा सूत्र -जैविक खाद का उपयोग
किसान फसल के अवशेष खेत में डालकर उनके रजकण बनाएं और ऐसे रुप में ले आएं कि फसल की पौध उसको ठीक तरह से खा सके। 10 किलो गोबर, 400 लीटर पानी, एक किलो गुड़, एक किलो चने का आटा मिलाकर पांच दिन में जीवामृत खाद बनाएं। पंप से आधे एकड़ में छिड़काव कर सकते हैं। खेत का एरिया अधिक होने पर मात्रा इसी तरह बढ़ा सकते हैं। इसके बाद यूरिया लगाने की जरूरत नहीं है। एनपीके खाद के तत्व की पूर्ति के लिए खेत में गड्ढा बनाकर उस पर पक्की फर्श करा लें और उसे ढक लें। उसमें गोबर इकट्ठा करें। नेडप विधि से 45 दिन में खाद बनेगी। केचुआ खाद बनाने के लिए दो किलो केचुआ लाकर उनको गोबर में दबा दें। एक केचुआ एक बरस में दो लाख नए केचुआ बनाता है। दो लाख केचुआ एक महीने में छह हजार किलो खाद बनाते हैं। किसान केचुआ खाद बेचकर अतिरिक्त आमदनी भी कर सकते हैं। जो केचुआ मिट्टी खाता है, वह खाद नहीं बनाता। लाल रंग का केचुआ मिट्टी ही खाद बनाएगा जिसे साउथ अफ्रीकन के नाम से भी जाना जाता है।
किसानों के लिए हेल्पलाइन नंबर
डा. तोगड़िया ने किसानों के लिए 0756747607080 हेल्पलाइन नंबर जारी किया। कहा कि किसान सुबह आठ से रात आठ बजे तक अपनी किसी भी समस्या के लिए फोन कर सकते हैं। कृषि वैज्ञानिक उनका समाधान कराएंगे। इससे पहले डा. तोगड़िया का फरीदपुर में मानवेंद्र प्रताप सिंह राणा के आवास पर फूल मालाएं पहनाकर स्वागत किया गया।
ये शामिल हुए
प्रशिक्षण शिविर में चांसलर उमेश गौतम, ईश्वरी जी, राहुल गुप्ता, राजीव सिंह, बिल्डर अजय गुप्ता, विधायक बहोरनलाल मौर्य, पप्पू भरतौल और केसर सिंह के अलावा पवन अरोड़ा, भाजपा जिलाध्यक्ष रवींद्र सिंह राठौर, मनीकांत शर्मा, राजीव साहनी, राजेश पाठक, राम कुमार, अमित शर्मा, धीरज खुराना, डा. एन गंगवार आदि मौजूद थे।