शहर के रिहायशी इलाकों में तंग गलियों और भीड़भाड़ वाले बाजारों में भी कई अस्पताल हैं। अगर वहां कोई अनहोनी हो जाए तो बचाव दल का पहुंचना भी मुश्किल है। इन अस्पतालों के निर्माण में नेशनल बिल्डिंग कोड (एनबीसी) का भी अनुपालन नहीं किया गया है लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने उन्हें लाइसेंस जारी कर दिए हैं। शहर में 450 अस्पतालों में से सिर्फ 17 के पास ही फायर एनओसी है। इसके बाद भी सारे अस्पताल न सिर्फ संचालित हो रहे हैं बल्कि उन्हें सीएमओ की ओर से संचालन की अनुमति भी मिली हुई है।
संकरी गलियों में नहीं पहुंच पाएंगी दमकल गाड़ियां
पतली गलियों में दमकल विभाग का सहायता पहुंचाना भी बहुत मुश्किल है। इस समय दमकल सहायता के लिए दो मोटर साइकिल और चार सौ हाईप्रेशर सिस्टम की गाड़ियां ही उपलब्ध हैं जो पतली गलियों में जा सकती हैं। पर इनकी क्षमता हल्की आग बुझाने की है। हालांकि मुख्य अग्निशमन अधिकारी केएम रावत का कहना है कि लंबे पाइप की उपलब्धता है इसलिए व्यवस्था करके ऐसे इलाकों में भी फायर फाइट कर सकते हैं।
यह हैं गाइडलाइन
नेशनल बिल्डिंग कोड के अनुसार सभी भवनों को फायर एनओसी लेना आवश्यक है।
अस्पताल के बाहर की रोड 12 मीटर चौड़ी होनी चाहिए। जहां दमकल गाड़ियों के आवागमन के लिए हाईड्रॉलिक प्लेटफार्म और टर्न टेबिल लोडर लगे हो। प्रवेश द्वार की चौड़ाई छह मीटर से कम नहीं होनी चाहिए।
अस्पताल का 40 प्रतिशत स्टाफ आपातकालीन स्थिति में लोगों की सुरक्षित निकासी कराने के लिए प्रशिक्षित हो। इस टीम का हेड फायर अफसर होना चाहिए।
अस्पताल का भवन फायर प्रूफ हो और इसे इस तरह बनाया जाए कि दुर्घटना की स्थिति में किसी भी मरीज या अस्पताल स्टाफ की जान पर जोखिम न आए। अस्पताल की प्रॉपर्टी को कम से कम नुकसान हो ताकि जल्द रिकवरी हो सके और मरीजों का इलाज प्रभावित न हो।
आपातकाल में नियंत्रण कक्ष तक पहुंचना आसान हो। इस कक्ष को अलार्म से जोड़ा जाए।
पंप और पंप कक्ष बना हो।
इलेक्ट्रानिक और डीजल पंप उपलब्ध हो।
आपात स्थिति में वेंटिलेशन का प्रावधान हो।
स्टाफ के प्रशिक्षण और फायर यंत्रों को सक्रिय रखने के लिए फायर ड्रिल कराई जानी चाहिए।
यार्ड हाइड्रैंट्स की उपलब्धता हो।
छिड़काव यंत्र 15 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हो।
फायर अलार्म सिस्टम और आग बुझाने के यंत्र हों।