बेहद चौंकाने वाली बात है कि मेडिकल हब माने जाने वाले बरेली शहर में संचालित करीब 450 अस्पतालों में महज 17 ही आग से निपटने में सक्षम हैं। अग्निशमन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, बाकी अस्पतालों में अग्निकांड की स्थिति में बचाव के इंतजाम नहीं हैं। फायर सिस्टम तो लगे है, लेकिन सिर्फ दिखावटी हैं। इंस्टिंग्युशर सिलेंडर नजर तो आते हैं, लेकिन ये चलाए नहीं जा सकते हैं। ज्यादातर एक्सपायर हो चुके हैं। अग्निशमन विभाग के इनपुट के बाद प्रशासन सभी अस्पतालों पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रहा है।
अग्निशमन विभाग के मुताबिक, रामपुर गार्डन, डीडीपुरम्, राजेंद्रनगर, पीलीभीत हाईवे, मिनी बाईपास की तरफ चलने वाले निजी अस्पतालों ने निर्माण के वक्त अग्निशमन यंत्रों की क्रियाशीलता का प्रमाणपत्र लिया था, लेकिन नवीनीकरण नहीं कराया। 2017 के रिकॉर्ड के मुताबिक, फायर एनओसी वाले अस्पतालों की संख्या घटकर सिर्फ 17 रह गई है। एनओसी न लेने वाले अस्पतालों को नोटिस भी जारी किया जाता है।
फायर डिपार्टमेंट ने माना, साईं अस्पताल सुरक्षित नहीं
हादसे के बाद सामने आया कि र्साइं अस्पताल के पास भी फायर एनओसी नहीं थी। अग्निकांड के बाद सिविल लाइंस फायर स्टेशन के अग्निशमन द्वितीय अधिकारी रजीउद्दीन ने अपनी टीम के साथ अस्पताल का मुआयना किया था। उन्होंने नगर मजिस्ट्रेट यूपी सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि शासनादेश 2012 के अनुपालन में अस्पताल भवन एनबीसी मानक के अनुसार नहीं मिला है। उन्होंने अस्पताल भवन को अग्नि सुरक्षा मानकों के भी विपरीत बताया है।
2014 में यंत्रों की क्रियाशीलता का प्रमाणपत्र हुआ था जारी
डॉ. शरद अग्रवाल ने बताया कि उनके पास फायर एनओसी है, जबकि अग्निशमन विभाग से मालूम करने पर पता चला कि साईं अस्पताल के पास एनओसी नहीं बल्कि अग्निशमन यंत्रों की क्रियाशीलता का प्रमाण पत्र था। अग्निशमन विभाग से पता करने पर सामने आया कि 2014 में तत्कालीन सीएफओ विवेक शर्मा ने र्साइं अस्पताल को अग्निशमन यंत्रों की क्रियाशीलता का प्रमाणपत्र दिया था, लेकिन भवन को एनओसी नहीं दी गई थी। इस पर डॉ. शरद ने कहा कि यह तकनीकी बिंदु है, इसके बारे में उन्हें पता नहीं है।
अस्पतालों ने फायर सिस्टम सुधारने शुरू किए
र्साइं अस्पताल में हादसे के बाद प्रशासन के सख्त रुख को देखते हुए कई निजी अस्पतालों ने फायर सिस्टम दुरुस्त करने शुरू कर दिए हैं। इंस्टिंग्युशर सिलेंडर की एक्सपायरी डेट जांची जाने लगी है।
सिर्फ इन अस्पतालों के पास है फायर एनओसी
लीलावती आयुर्वेदिक अस्पताल, सूद धर्मकांटा
महाराणा प्रताप जिला अस्पताल
जिला अस्पताल, 100 बेड
संजीवनी मेडिकल सेंटर, फरीदपुर
हेमित हॉस्पिटल
एसके नर्सिंग होम, प्रेमनगर
लाइफ केयर नर्सिंग होम
हैदर्स हार्ट एंड मदर केयर सेंटर, पीलीभीत रोड
न्यू धन्वंतरि हॉस्पिटल, बीसलपुर रोड
न्यू मिशन अस्पताल, शीशगढ़
कृतिका आयुर्वेदिक अस्पताल, पीलीभीत रोड
श्रीनाथ नगरी अस्पताल, शांतिनगर
डॉ. कपिल अग्रवाल नर्सिंग होम, एकतानगर
नाथ हॉस्पिटल, उदयपुर
खुशलोक अस्पताल, स्टेडियम रोड
बाल किशन अस्पताल, शाहजहांपुर रोड
वर्जन
सिर्फ अस्पताल ही क्यों? आप शैक्षणिक संस्थान, बड़े बाजार सहित सभी संस्थानों को देखिए। अगर कुछ संस्थानों के पास एनओसी नहीं है तो उन्हें उचित समयावधि दी जाए ताकि वे कमियों को पूरा कर सकें। किसी संस्थान को बंद करने की कार्रवाई तो कोई हल नहीं है।
- डॉ. प्रमेंद्र माहेश्वरी, प्रेसीडेंट, आईएमए
ज्यादातर अस्पतालों के पास फायर एनओसी नहीं है, जिन्होंने सक्रियता दिखाई उन्होंने भी नवीनीकरण नहीं कराया। 2017 के रिकार्ड के मुताबिक, सिर्फ 17 अस्पतालों के पास ही फायर एनओसी है।
- केएन रावत, सीएफओ
विद्युत सुरक्षा को लेकर भी मिलीं तमाम खामियां
बरेली। सहायक निदेशक (विद्युत सुरक्षा) राजमणि ने टीम के साथ साईं अस्पताल पहुंचकर वायरिंग, लोड और अन्य तकनीकी पहलुओं की जांच की। जांच में पाया गया कि परिसर में विद्युत सुरक्षा मानकों के विपरीत कनेक्शन चल रहा था और कम एंपियर वाले केबिल पर ज्यादा लोड इस्तेमाल हो रहा था। इसी वजह से तार पिघल गया और शॉर्ट सर्किट हुआ। 2006 में कनेक्शन लिया गया था। इसके बाद से सुरक्षा निदेशालय से निर्धारित मानकों का परीक्षण और नवीनीकरण नहीं कराया गया। अस्पताल प्रबंधक को मामले में नोटिस भी दिया गया था। इसके बावजूद कोई कदम नहीं उठाया गया। उप निदेशक, विद्युत सुरक्षा कार्यालय ने अपनी रिपोर्ट में अस्पताल परिसर में चल रहे कनेक्शन को मानक के विपरीत बताते हुए भवन में बिजली इस्तेमाल पर रोक लगाने की संस्तुति की है। मंगलवार दोपहर जांच रिपोर्ट डीएम कार्यालय पहुंच गई।