बरेली। शिक्षिकाएं जिले के विशेष बच्चों को कॅरिअर के साथ जीवन में भी आगे बढ़ने का गुरुमंत्र दे रही हैं। इनमें कई शिक्षिकाएं ऐसी भी हैं, जिन्होंने इन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने दो-तीन दशक समर्पित कर दिए हैं। ये न केवल नौकरी कर रही हैं, बल्कि सही मायनों में समग्र शिक्षा की परिभाषा को जीवांत कर रही हैं।
साढ़े तीन दशक किए समर्पित
भुवनेश्वर की मूल निवासी शस्वती नंदा बरेली में 34 वर्षों से विशेष बच्चों के लिए कार्य कर रही हैं। वह बताती हैं कि शुरुआत में दो कमरों का स्कूल खोला, विशेष शिक्षकों को ट्रेनिंग दी। बच्चों के लिए मेडिकल सपोर्ट की जरूरत महसूस हुई तो प्रशासन का साथ मिला। सहायता के लिए संस्थाएं आगे आने लगीं। शुरुआत केवल छह बच्चों से हुई, वर्तमान में 190 से अधिक विद्यार्थियों को हुनरमंद बना रही हैं।
शुरुआत में लगता था डर
16 वर्षों से विशेष बच्चों के लिए कार्य रहीं राखी सागर बताती हैं कि शुरुआत में वह डरती थीं, फिर विशेष बच्चों के साथ आनंद आने लगा। उनके पढ़ाए तीन विद्यार्थी सामान्य विद्यालय में शिक्षा ले रहे हैं। एक विशेष विद्यार्थी अब अपने दूसरे साथियों को सीखने में सहायता करने लगा है। राखी का मानना है कि शिक्षक की जीत तभी होती है जब उसका विद्यार्थी आत्मनिर्भर होकर समाज में चलने लगे।
विशेष बच्चों को प्रेम की जरूरत
सुभाषनगर की प्रज्ञा सक्सेना 20 साल से विशेष बच्चों को पढ़ाने के साथ ही विभिन्न गतिविधियां सिखा रही हैं। उनका कहना है कि ये बच्चे अपने दैनिक कार्य करने में जूझते हैं। इन्हें अनुशासन से अधिक प्रेम देना होता है। इससे बच्चे हमारे आस-पास सुरक्षित महसूस करने लगते हैं। शुरुआत में विशेष बच्चों के साथ काम करना मुश्किल लगता था। अब उनकी जटिलताओं को आसान करने का अनुभव हो गया है।