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बाल दिवस- चाचा नेहरू के लाड़ले फंसते जा रहे हैं नशे के भंवर में

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बरेली। कोमल मन, चंचल स्वभाव, खेल और पढ़ाई की धुन.. अगर आपके लाडले के स्वभाव में इससे इतर जरा सा भी बदलाव आए तो फ्रिकमंद हो जाइए। उसकी वजह तलाश कीजिए। कहीं आपका लाडला स्कूल में खराब संगत में पड़कर नशे का आदी तो नहीं बनता जा रहा। जी हां, इन दिनों स्कूली बच्चे व्हाइटनर के नशे के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। इसका प्रमाण यह है जिला अस्पताल के मनोचिकित्सकों के पास हर महीने ऐसे 50-60 केस पहुंच रहे हैं। ये बच्चे किसी न किसी कान्वेंट स्कूल में पढ़ने वाले हैं और व्हाइटनर, पेट्रोल, मादक इनहालेंट से नशा करने के आदी हो चुके हैं। अब माता-पिता उनकी काउंसलिंग करा रहे हैं।
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यह है पहचान
- नींद न आना, भूख न लगना, बात-बात पर गुस्सा होना, स्वभाव में चिड़चिड़ापन, पढ़ाई में मन न लगना, सुस्त रहना।

यह हैं नुकसान
- सोचने समझने की क्षमता कम होना, शरीर कमजोर होना, अवसाद ग्रस्त होना, लिवर, किडनी और फेफड़े खराब होना।

केस एक
शहर के एक नामी स्कूल में बारह साल का बच्चा व्हाइटनर को रुमाल में लगाकर सूंघ रहा था। उसके साथ चार बच्चे और थे। सीसीटीवी कैमरे से जब उसे देखा गया तो शिक्षक ने उसे पकड़ा। प्रधानाचार्य ने उसे जिला अस्पताल भेजा। काउंसलिंग की गई तो हैरान करने वाली बात सामने आई। वह बच्चा काफी समय से व्हाइटनर सूंघ रहा है। उसके साथ अन्य बच्चे भी इसके आदी हो गए हैं। अब बच्चे की काउंसलिंग की जा रही है।
केस दो
राजेंद्रनगर में एक बारह साल का बच्चा कॉलोनी में खड़ी बाइकों से पेट्रोल चुराता है। एक दिन वह पेट्रोल निकालते पकड़ लिया गया। माता-पिता ने कड़ाई से पूछा तो उसने बताया कि वह पेट्रोल सूंघता है। माता-पिता उसे जिला अस्पताल में मनोचिकित्सक के पास लाए। अब उसकी काउंसलिंग की जा रही है।
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नशा देता है दिमाग को सुकून तो हो जाते हैं आदी
जिला अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. आशीष सिंह बताते हैं कि इन दिनों स्कूली बच्चों में व्हाइटनर से नशा करने की प्रवृति बहुत तेजी से बढ़ रही है। हर माह औसतन 50 केस सामने आ रहे हैं। इनमें 8 से 16 साल तक के बच्चे हैं। ये सभी किसी ने किसी कान्वेंट स्कूल में पढ़ते हैं। उन्होंने बताया कि व्हाइटनर को सूंघते हैं तो वह नाक की झिल्ली होकर से दिमाग तक पहुंचता है। कुछ देर को इससे सूकून मिलता है लेकिन फिर यह आदत बन जाती है। उन्होंने बताया कि ऐसे केस में बच्चों को नींद न आना, भूख न लगना, गुस्सा करना जैसी शिकायतें बढ़ जाती हैं। ऐसे बच्चों की काउंसलिंग की जा रही है।

बच्चों का लिवर, किडनी और फेफड़े हो सकते हैं खराब
जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. वागीश वैश्य के अनुसार व्हाइटनर में टोलूडीन, ट्राइक्लोरो इथाइलीन होता है जो सूंघने के बाद खून में पहुंच जाता और आठ से दस घंटे तक इसका असर रहता है। कुछ समय तक अनिद्रा, चिड़चिड़ाहट, भूख न लगने जैसी समस्याएं रहती हैं। अगर लंबे समय तक बच्चे इसका इस्तेमाल करते हैं तो यह लिवर, किडनी और फेफड़ों को खराब कर सकता है। उन्होंने बताया कि बच्चे इंसोमिया यानी नींद न आने की बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं। इसका असर बच्चों के सोचने समझने की क्षमता पर भी पड़ता है। शारीरिक विकास भी बाधित होता है।

बहुत कम उम्र में बच्चों के हाथों में मोबाइल पहुंच जाते हैं। कई चीजें वह इससे ही सीखते हैं। स्कूल में बच्चों को गलत चीजों के बारे में सावधान भी किया जाता है। साथ ही शिक्षक भी उन पर नजर रखते हैं। सीसीटीवी कैमरों से भी नजर रखी जाती है कि बच्चे खेलकूद के दौरान किसी गलत चीज का उपयोग तो नहीं कर रहे। बच्चों में नशे की लत बढ़ रही है। इसे लेकर स्कूल संचालकों को गंभीर होने की जरूरत है। - दीपक अग्रवाल, प्रधानाचार्य बीबीएल स्कूल
छोटे बच्चे एक दूसरे को देखकर जल्दी सीखते हैं। नैतिक शिक्षा की कक्षा में बच्चों को नशे के दुष्परिणाम के बारे में बताते भी हैं। शिक्षक भी बच्चों पर नजर रखते हैं, ताकि वे गलत हरकतों में न पड़ें। अगर बच्चे व्हाइटनर से नशा कर रहे हैं तो बेहद गंभीर बात है। इसको लेकर स्कूल एसोसिएशन के सदस्यों से बात भी करेंगे ताकि बच्चों को इससे दूर रखा जा सके। - पारुष अरोड़ा, अध्यक्ष इंडिपेंडेंट स्कूल एसोसिएशन
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