बरेली शहर: 350 से ज्यादा अस्पताल : 12 सौ से ज्यादा डॉक्टर
शहर के अस्पतालों का दो-तीन महीने पुराना नजारा जरा याद कीजिए। मरीजों से भरी ओपीडी, नंबर आने के लिए ही घंटों इंतजार फिर डॉक्टर की ओर से लिखी गई अपनी जांच के लिए पैथोलॉजी लैब की दौड़ और इतना ही लंबा इंतजार, हजारों रुपये की दवाएं और लंबा इलाज। अकेले कोरोना ने यह सब खत्म कर दिया। सैकड़ों अस्पताल अब सन्नाटे में डूबे हुए हैं, डॉक्टरों के पास इतनी फुर्सत है कि समय काटने के रास्ते ढूंढने पड़ रहे हैं और सबसे बड़ी बात जो हजारों मरीज रोजाना अस्पतालों की ओर रुख करते थे, उनमें भी ज्यादातर अपने घरों पर आराम से हैं। लॉकडाउन में कोरोना के डर से प्राइवेट अस्पतालों से लौटाई गई एक गर्भवती महिला और बुखार से सुभाषनगर के एक 15 महीने की मासूम को छोड़ दिया जाए तो ऐसी भी कोई खबर नहीं आई कि इलाज न मिलने से किसी की जान चली गई हो। अलग किस्म के कुछ किस्से हुए तो यही कि कैंट इलाके की तीन साल की बच्ची की कटी उंगली के इलाज इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि घरवाले अस्पताल में एडवांस 15 हजार जमा नहीं कर पाए। ऐसे ही प्रसव पीड़ा में जिंदगी और मौत से जूझती एक महिला के घरवालों को भी कई अस्पतालों से लौटाया गया और फिर हजारों रुपये एडवांस जमा करने के बाद इलाज मिल पाया।
60 करोड़ रुपये बरसाने वाली ओपीडी में सन्नाटा, अस्पतालों में छंटनी शुरू
बरेली। कहा तो जाता है कि जहां जितनी बीमारी फैलती है वहां अस्पतालों की ‘रौनक’ उतनी ही बढ़ती है लेकिन कोरोना के दौर में इस मामले में भी उल्टा ही हुआ है। इस महामारी ने अस्पताल उद्योग को ही सबसे ज्यादा तबाह किया है। उच्चस्तरीय सुविधाओं वाले जिन अस्पतालों की शोहरत से दूर-दूर के मरीज खिंचे चले आते थे, उन अस्पतालों की हर महीने औसतन 60 करोड़ रुपये बरसाने वाली ओपीडी ही बमुश्किल 10 फीसदी पर सिमटकर रह गई है। हालात में जल्द बदलाव न आने की आशंका देखते हुए कई अस्पतालों ने अपने स्टाफ की छंटनी शुरू कर दी है।
कोरोना और लॉकडाउन ने फिजीशियन पर तो फिर भी कुछ हद तक मेहरबानी रखी है लेकिन बाकी अस्पतालों और डॉक्टरों को तबाही जैसी स्थिति में ला खड़ा कर दिया है। डॉक्टर कह रहे हैं कि अब उन्हें अपने स्टाफ को सैलरी देना भी मुश्किल हो रहा है। दरअसल सरकार ने कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका के मद्देनजर अस्पतालों को जनरल ओपीडी बंद रखने को कहा है। उन्हें सिर्फ इमरजेंसी में मरीजों का इलाज करने की इजाजत है। अस्पतालों को सबसे ज्यादा कमाई ओपीडी से ही होती थी। आम अस्पतालों में परचा ही पांच सौ से आठ सौ रुपये तक का बनता है। मरीज को देखने के बाद डॉक्टर उन्हें जो दवाएं लिखते थे, उनमें भी उनका कमीशन होता था जो फिलहाल बंदी जैसी हालत में है। हालांकि डॉक्टरों का यह भी कहना है कि लॉकडाउन में ऐसे मरीज भी अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे हैं जो गंभीर हैं। पुलिस की सख्ती का डर ऐसा है कि लोग तबीयत बिगड़ने पर भी अस्पताल का रुख नहीं कर रहे। देहात से इक्का-दुक्का मरीज ही हालत काफी बिगड़ने के बाद आ पा रहे हैं।
बता दें कि लखनऊ और दिल्ली के बीच मेडिकल हब की पहचान रखने वाले बरेली के अस्पतालों में मंडल के दूसरे तीनों जिलों के साथ उत्तराखंड, नेपाल, लखीमपुर खीरी और तमाम और जिलों के मरीज इलाज के लिए पहुंचते थे लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक पिछले डेढ़ महीने में हालात इस कदर बदले हैं कि बरेली के बाहर के बमुश्किल दो-चार मरीज यहां इलाज कराने पहुंचे होंगे।
डॉक्टर अलग, स्टाफ की सैलरी पर ही खर्च हो जाते हैं 12 से 20 लाख
मध्य वर्ग के अस्पताल चलाने वाले डॉक्टर यह तो नहीं बताना चाहते कि उन्हें कोरोना की वजह से कितना घाटा हुआ है लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि उन्हें अपने अस्पतालों में स्टाफ को सैलरी देना ही मुश्किल हो रहा है। तमाम सुविधाओं से लैस इन अस्पतालों में डॉक्टरों को अगर छोड़ भी दिया जाए तो पैरामेडिकल स्टाफ, नर्स और सफाई कर्मी, गार्ड आदि को मिलाकर करीब 12 से 20 लाख रुपये तक हर महीने सैलरी का ही खर्च है। डॉक्टर साख पर असर पड़ने के डर से पैरामेडिकल स्टाफ को हटाने से हिचक रहे हैं लेकिन कई अस्पतालों में सफाई कर्मी, गार्ड और नए माहौल में गैर जरूरी हुए दूसरे स्टाफ को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
डॉक्टरों के मुताबिक एक तो अस्पतालों की आय खत्म हो चुकी है, ऊपर से इन्फेक्शन प्रिवेंशन प्रोटोकॉल की शर्तें पूरी करने के लिए अलग खर्चा करना पड़ रहा है। इस प्रोटोकॉल के तहत अस्पतालों में दिन में दो बार सैनिटाइजेशन के साथ पीपीई किट पहनना जरूरी हो गया है। बचाव के उपायों पर कई और खर्च बढ़ गए हैं। इसके बाद भी तनाव यह है कि जरा कोई नियम का उल्लंघन हो जाए तो स्वास्थ्य विभाग नोटिस जारी कर देता है।
आईएमए अध्यक्ष का दर्द.. उद्योगों को तो सब्सिडी दे दी.. हमारे बारे में नहीं सोचा
एक तो अस्पतालों में मरीजों की तादाद में भारी गिरावट हुई है और दूसरी तरफ इन्फेक्शन प्रिवेन्शन प्रोटोकॉल लागू होने से खर्च और बढ़ गए हैं। अस्पताल अपने स्टाफ को भी सैलरी दे रहे हैं। सरकार ने उद्योगों के लिए तो सब्सिडी दे दी है लेकिन इसमें अस्पतालों को शामिल ही नहीं किया गया है। - डॉ. राजेश अग्रवाल, अध्यक्ष, आईएमए
लॉकडाउन की वजह से बरेली मंडल के जिलों के साथ दूसरे राज्यों से आने वाले मरीज भी अस्पतालों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। दूसरी ओर अस्पतालों में पहले से भी ज्यादा व्यवस्थाएं रखने के निर्देश दिए गए हैं। स्टाफ की सैलरी हर हाल में देनी ही है। अनुमान लगाया जाए तो बरेली के अस्पतालों में औसतन 85 फीसदी तक मरीज कम हुए हैं। - डॉ. विनोद पागरानी, उपाध्यक्ष आईएमए
लॉकडाउन में दूसरे कारोबारों को जो नुकसान हो रहा है, उससे कहीं ज्यादा अस्पतालों को मंदी से गुजरना पड़ रहा है। दूसरे उद्योग धंधे बंद हैं लेकिन अस्पतालों को खुले रखने के निर्देश हैं। दूसरी तमाम जगह स्टाफ की छंटनी हो रही है लेकिन अस्पताल में यह भी नहीं किया जा सकता है। - डॉ. राजीव गोयल, सचिव आईएमए सचिव
25 प्रतिशत घट गई एलोपैथिक दवाओं की सेल
दवा कारोबारियों के मुताबिक लॉकडाउन के बाद दवाओं की सेल एकाएक बढ़ी थी लेकिन उसके बाद लगातार गिरावट आ रही है। डिस्ट्रिक्ट बरेली केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष दुर्गेश खटवानी ने बताया कि इस महीने दवाओं की सेल में करीब 25 फीसदी गिरावट रिकॉर्ड की गई है। उन्होंने बताया कि अस्पतालों में ओपीडी बंद है। मरीज सीधे भी नहीं आ रहे। काफी लोगों ने शुरू में ही काफी समय के लिए दवाएं खरीदकर रख ली थीं। प्रदूषण स्तर कम होने से एलर्जी की वजह से होने वाली बीमारियां भी काफी कम हुई हैं। बुखार, खांसी, जुकाम, वायरल फ्लू के मरीज आश्चर्यजनक ढंग से कम हो गए हैं।
70 फीसदी बिजनेस घट गया पैथोलॉजी लैब का
भीड़ से भरी रहने वाली तमाम लैब में अब कई-कई दिन नहीं आ रहा कोई मरीज
कोरोना से पहले अस्पतालों में आने वाले ज्यादातर मरीजों को डॉक्टर सीधे पैथोलॉजी लैब का रास्ता दिखा देते थे लेकिन अब अब चूंकि अस्पतालों में ही मरीज नहीं आ रहे लिहाजा शहर की कई पैथोलॉजी लैब में भी ताले लगने की नौबत है। जिन लैब में मरीजों को पहले जांच कराने और रिपोर्ट के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था, उनका हाल अब यह है कि कई-कई दिन में एक मरीज जांच कराने नहीं आ रहा है। शहर में एक कारपोरेट पैथोलॉजी चला रहे फ्रेंचाइजी ने बताया कि पिछले डेढ़ महीने में उनकी पैथोलॉजी पर 70 फीसदी से ज्यादा कारोबार प्रभावित हुआ है। अस्पतालों में ओपीडी बंद हैं लिहाजा मरीज को पता ही नहीं लग रहा है कि उन्हें क्या जांच करानी चाहिए। वे बिना रोग की जानकारी के ही दवाएं ले रहे हैं।
10 गुना बढ़ा आयुर्वेदिक दवाओं पर यकीन
कोरोना संक्रमण के दौर में लोगों ने की आयुर्वेदिक दवाओं भारी खरीदारी
कोरना संकटकाल में आयुर्वेदिक दवाओं का बाजार जबर्दस्त बूम पर है। लोगों का किस कदर आयुर्वेदिक दवाओं पर विश्वास बढ़ा है, इसका आकलन आयुर्वेदिक दवा कारोबारियों के इस दावे से लगाया जा सकता है कि आयुर्वेदिक दवाओं की सेल दस गुना तक बढ़ गई है। सबसे ज्यादा वे दवाएं बिक रही हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती हैं। आयुर्वेदिक दवा कारोबारी पंकज अरोड़ा के मुताबिक गर्मी में आमतौर पर आयुर्वेदिक दवाओं की मांग कम होती है मगर इस बार कई सालों का रिकॉर्ड टूट गया है। च्यवनप्राश जैसे टॉनिक के अलावा सर्दी, खांसी, जुकाम, बुखार की दवाओं की भी सेल 25 फीसद से ज्यादा बढ़ गई है। गिलोय, तुलसी, नीम जैसी जड़ी बूटियों के अर्क की डिमांड लगातार बनी हुई है।
मनोवैज्ञानिक का नजरिया..
लॉकडाउन में बदल गई लोगों की सोच
कोरोना संक्रमण के दौर में लोगों की सोच में काफी बदलाव आया है। पहले जहां लोग मामूली वायरल इन्फेक्शन या एलर्जी जैसी दिक्कत होने पर भी सीधे डॉक्टरों के पास पहुंच जाते थे, वे अब अस्पताल जाने से बच रहे हैं या फिर इलाज का दूसरा रास्ता तलाश रहे हैं। इसके पीछे यह डर भी है कि अस्पताल जाकर कहीं वे दूसरे मरीजों के संपर्क में आने से खुद भी संक्रमित न हो जाएं। तमाम लोगों को एंटीबॉयोटिक दवाएं खाने से अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी उल्टा असर पड़ने की आशंका है लिहाजा वे एलोपैथिक दवाओं से बच रहे हैं। -डॉ. आशीष, जिला अस्पताल मनकक्ष के मनोवैज्ञानिक
सरकारी डॉक्टर की बात..
मरीज तो अब सरकारी अस्पतालों में भी नहीं
जिला अस्पताल में सबसे ज्यादा देहात के सरकारी अस्पतालों से रेफर होकर मरीज आते थे। ये ऐसे मरीज होते थे जिनके पास किसी निजी अस्पताल में जाकर अपना इलाज कराने लायक पैसा नहीं होता था। निजी अस्पतालों की स्थिति यह है कि मरीज की माली हालत चाहे जैसी हो, वहां बिना परचे के उसका इलाज ही शुरू नहीं होता है। मैं खुद रोजाना ओपीडी में दो से तीन सौ मरीज देखता था। कोरोना संकट में ओपीडी बंद होने के बाद अब फ्लू कॉर्नर बना है लेकिन यहां भी एक दिन में बमुश्किल 20 मरीज ही पहुंच रहे हैं। कई मरीज ऐसे हो सकते हैं जो लॉकडाउन की वजह से अस्पताल न आ पा रहे हों। - डॉ. वागीश वैश्य, वरिष्ठ फिजीशियन जिला अस्पताल
..मगर गंभीर मरीजों को दिक्कत
करीब चार महीने पहले मेरी बाईपास सर्जरी हुई थी। लॉकडाउन से पहले सब ठीक था मगर अब काफी समस्या हो रही है। चौराहे पर पुलिस परचा दिखाने के बाद भी दवा लेने नहीं जाने देती। मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा था मगर अब डॉक्टर से मुलाकात नहीं हो पा रही है। मेडिकल स्टोर का नंबर लेकर जैसे-तैसे दवा मंगा ली है लेकिन यह डर भी है कि बगैर डॉक्टर को दिखाए दवा खाना कहीं नुकसान न कर जाए। - विनोद अडवानी, मरीज
करीब 14 सालों से डायबिटीज का मरीज हूं। लॉकडाउन होने पर शुरुआत में कुछ दिन की दवाएं खरीद ली थीं लेकिन जब दोबारा लॉकडाउन बढ़ा तो करीब दो महीने तक की दवाएं एक बार में लेनी पड़ी हैं। करीब 15 दिन पहले दवा की दुकान पर गए तो वापस आते वक्त श्यामगंज चौराहे पर पुलिस ने बाइक पंक्चर कर दी और चालान भी काट दिया था। मजबूरी में डायबिटीज चेक करने की मशीन भी ले ली है। - जितेंद्र सिंह, मरीज