बरेली। सपने देखने की कोई उम्र या सीमा नहीं होती। अगर उन्हें पूरा करने का जज्बा पक्का हो तो हर बाधा पार की जा सकती है। इसे सच कर दिखाया है नवाबगंज क्षेत्र के गांव पचपेड़ा निवासी युवा एथलीट प्रभांशु कुमार ने। अभाव के बीच उन्होंने होटलों में काम करके अपनी खुराक जुटाई और पदकों का शतक पूरा कर परिवार का नजरिया बदल दिया।
प्रभांशु का बचपन से ही एथलेटिक्स की तरफ झुकाव था। उनके पिता वेद राम गांव में ही मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं। पिता की हमेशा यही इच्छा थी कि उनका बेटा पढ़-लिखकर आगे बढ़े। इसके चलते शुरुआत में उन्होंने प्रभांशु के खेलकूद के शौक का विरोध भी किया। हालांकि, प्रभांशु ने विरोध के बावजूद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना जारी रखा। जब उन्होंने एक के बाद एक पदक जीतने शुरू किए तो पिता का नजरिया बदल गया। वह बेटे को सहयोग देने लगे।
प्रभांशु 1500 और 3000 मीटर मैराथन के धावक हैं। अब तक के सफर में वह 100 से अधिक पदक जीत चुके हैं, जिनमें 50 से ज्यादा स्वर्ण पदक शामिल हैं। उनके इस सफर की शुरुआत स्कूल गेम्स से हुई थी, जहां उन्हें दूसरा स्थान मिला था। इसके बाद उन्होंने कसम खाई कि अगली बार या तो पहला स्थान आएगा या वह दौड़ना ही छोड़ देंगे। इसके बाद उन्होंने अगली प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल करके ही दम लिया।
खेलकूद की तैयारी और अपनी डाइट के खर्चे को उठाने के लिए उन्होंने एक निजी होटल में काम तक किया। अपने खेल को और बेहतर बनाने के लिए उन्होंने कोच अजय कश्यप के मार्गदर्शन में रोड नंबर चार पर अभ्यास शुरू किया। गांव से आने-जाने में लगने वाले समय को बचाने के लिए उन्होंने वसंत विहार में किराये पर कमरा लेकर रहना शुरू कर दिया।
उनकी इस मेहनत का परिणाम राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी देखने को मिला। प्रभांशु ने दिल्ली में आयोजित ओपन स्टेट प्रतियोगिता में चौथा स्थान प्राप्त किया, वहीं उत्तराखंड के खटीमा में आयोजित पांच किलोमीटर मैराथन दौड़ में प्रथम स्थान हासिल कर अपने क्षेत्र का नाम रोशन किया।