बरेली। शहर के दो रूटों पर 24 ई-बसें घाटे में दौड़ रही हैं। इनके संचालन पर प्रतिदिन करीब 25 हजार रुपये का खर्च आ रहा है, जबकि कमाई महज 15 हजार रुपये ही हो पा रही है।
जब 14 ई-बसें फरीदपुर रूट पर दौड़ रही थीं तो उनकी एक दिन की औसत कमाई 30-40 हजार रुपये प्रतिदिन थी। बसों ने जैसे ही शहर की राह पकड़ी, उनका सामना अव्यवस्थाओं से हुआ। जगह-जगह ऑटो वालों का दबदबा है। वह ई-बसों को घेर लेते हैं। सवारियां ही नहीं बैठने देते हैं। वे ई-बस के स्टाफ से भिड़ जाते हैं। दूसरी ओर, शहर के दोनों रूटों पर अभी स्टाॅपेज नहीं बन पाए हैं। इसका भी सीधा असर बसों की कमाई पर पड़ रहा है। इसी कारण परिचालकों को पांच माह से वेतन भी नहीं मिल पाया है।
खर्च हजार रुपये, कमाई महज छह सौ
ई-बसों के संचालन में प्रतिदिन हजार रुपये से अधिक खर्च आ रहा है। चालकों को प्रतिदिन 500 रुपये तो परिचालकों को 499 रुपये पारिश्रमिक दिया जाता है। बसों की चार्जिंग और मेंटीनेंस का खर्च अतिरिक्त है। इसके विपरीत बसें प्रतिदिन औसतन छह सौ रुपये ही कमा पा रही हैं। फरीदपुर रूट पर यहीं बसें प्रतिदिन 2200 रुपये कमा रही थीं। शहर में ई-बसों को सवारियां ही नहीं मिल रही हैं। ऐसे में घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है।
किराये में गड़बड़ी से भी हो रही समस्या
ई-बसों के किराये में भी विसंगतियां हैं। इनका न्यूनतम किराया 11 और अधिकतम 38 रुपये है। जिस रूट पर ऑटो चालक दस रुपये किराया वसूलते हैं, उसी रूट पर ई-बस का किराया 16 रुपये है। तीन किलोमीटर तक का किराया 11 और छह किलोमीटर तक का 16 रुपये निर्धारित किया गया है। इस कारण भी सवारियां नहीं मिल रहीं। ई-बसों के चालक-परिचालक भी दबी जुबान से इस बात को स्वीकार कर रहे हैं।
वर्जन
बसों का संचालन धीरे-धीरे पटरी पर आ रहा है। सभी चालकों को निर्धारित स्टॉपेज पर बस रोकने का आदेश दिया गया है। बसों में लगे सीसी कैमरों से भी निगरानी की जा रही है। किला पुल पर वाहनों का संचालन शुरू होने के बाद स्थिति में तेजी से सुधार होगा। - राजेश पाठक, एआरएम सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड