बरेली। सिंचाई मंत्री धर्मपाल सिंह के इस्तीफे के साथ 2200 करोड़ की बदायूं सिंचाई परियोजना और अरिल नदी के कायाकल्प के प्रोजेक्ट को भी झटका लगा है। अपने निर्वाचन क्षेत्र में सिंचाई का संकट दूर करने के लिए लाई गई इन दोनों परियोजनाओं पर धर्मपाल सिंह काफी गंभीर थे लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी उनके लिए प्रदेश सरकार से बजट नहीं हासिल कर पाए थे। अब रही-सही आस भी टूट गई है। रामगंगा डैम पहले से अधूरा पड़ा हुआ है।
बदायूं सिंचाई परियोजना की शुरुआत सपा के शासन में हुई थी। सिंचाई के संकट से जूूझ रहे बरेली और बदायूं के हजारों किसानों की दिक्कत को देखते हुए करीब 2200 करोड़ की इस परियोजना को मंजूरी मिली थी जिसे वर्ष 2015 में पूरा किया जाना था। शुरूआत में शासन ने इसके लिए 630 करोड़ रुपये दिए थे। इस धनराशि से 311 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण हुआ। इससे रामगंगा पर बैराज बनने के साथ कुछ काम हुए थे लेकिन बजट के अभाव में आगे के काम रुक गए। परियोजना को पूरा करने के लिए बरेली और बदायूं में 469 किलोमीटर की नहर और रजबहा बनाने के लिए करीब 1600 करोड़ रुपये की जरूरत है। इस धनराशि से 1250 किसानों से 718 हेक्टेयर भूमि की खरीद की जानी है। बाढ़ खंड ने इस परियोजना का रिवाइज इस्टीमेट बनाकर शासन को भेजा था, लेकिन इससे मंजूरी नहीं मिल सकी थी। हाल में इस प्रोजेक्ट के बजट के लिए शासन की वित्त समिति ने स्वीकृत दे दी है। इसके बाद मंत्रिमंडल की जल्द होने वाली मीटिंग में सीएम योगी आदित्यनाथ को इसकी मंजूरी देना बाकी रह गया है।
अरिल नदी के कायाकल्प का प्रोजेक्ट भी अधर में लटका
बरेली। सिंचाई मंत्री के गृह जनपद से निकली अरिल नदी के कायाकल्प की योजना भी अधर में लटकी है। बदायूं, बरेली और रामपुर जिलों की सीमा में नदी की जलधारा 137 किलोमीटर लंबी है। बरेली में 57 किलोमीटर और बदायूं में 65 किलोमीटर का सफर तय करके नदी दातागंज के जमालपुर मधुकर नवादा में रामगंगा में मिलती है। सिंचाई मंत्री धर्मपाल सिंह के क्षेत्र आंवला के भी करीब चार दर्जन गांवों के बीच से होकर यह गुजरती है। हजारों हेक्टेयर भूमि को सिंचित करने वाली इस नदी का अतिक्रमण की वजह से दम घुट चुका है। सिंचाई मंत्री के दिलचस्पी लेने के बाद बाढ़ खंड की टीम ने इस नदी का सर्वे किया है। जिसमें नदी की जलधारा उद्गम स्थल से केवल 67 किलोमीटर तक ही मिली है। उसके आगे सिल्ट या खेती होने से अरिल का वजूद ही खत्म हो गया है। करीब 30 करोड़ से नदी के कायाकल्प के लिए योजना तैयार की थी। पूर्व डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह और सीडीओ सत्येंद्र कुमार ने खुद फावड़ा लेकर नदी का खुदान शुरू किया था। शुरूआत में तेजी के बाद पूरा प्रोजेक्ट ठप हो गया।