राष्ट्रीय कृषि विकास योजना खेती किसानी का विकास करने के बजाय अफसरों और नेताओं का ही विकास किया। कई विभागों में इस को ठिकाने लगा दिया गया। मार्च के अंतिम पखवाड़े में बाकी बची रकम खर्च करने के रास्ते ेतलाशे जा रहे हैं।
योजना से कृषि और भूमि संरक्षण विभाग को मृदा सर्वेक्षण के नाम पर 1.49 करोड़ रुपया दिया गया। इसमें किसानों के खेतों की मिट्टी का सर्वे के नाम पर अफसरों ने ढाई लाख रुपये ठिकाने लगा दिए। मृदा स्वास्थ्य सुधार के नाम पर 26.5 लाख रुपये हजम कर लिए। , एडावटिव ट्रायल (नई पद्धिति अपनाने में किए शोध) के लिए 7.69 लाख रुपये का खर्चा दिखा दिया। वहीं सोलर पंप की योजना में भी किसानों को अनुदान देने के लिए 1.12 करोड़ रुपये विभाग को दिए गए हैं। इस राशि को ठिकाने लगाने की तैयारी चल रही है।
इसी का दूसरा हिस्सा पशुपालन विभाग में टीकाकरण कार्य भी है। वैक्सीनेशन के नाम पर 4.64 लाख रुपया दिया गया। जिसमें से तीन लाख खर्च दिखा दिया गया। लघु सिंचाई के लिए 28.30 लाख रुपया मिला, जिसे लगभग पूरा ही खपा दिया गया। मत्स्य पालन के लिए 18.06 लाख रुपए दिए गया। जिसमें से 17.21 लाख का खर्च दिखाया गया है।
उद्यान विभाग को औद्यागिक कार्यों को बढ़ावा देने के लिए 6.40 लाख रुपया दिया गया था, जिसमें से 5.40 लाख रुपया खर्च कर दिया गया।
किसान तो हर बार छला गया
भाकियू के पूर्व मंडल अध्यक्ष और रिटायर बीडीओ चौधरी हरवीर सिंह कहते हैं कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना जैसी कई अन्य महत्वपूर्ण योजनाएं किसानों का भला करने के लिए बनाई गईं थीं। जबकि इनके मद का बीस फीसदी लाभ भी किसानों तक नहीं पहुंच पाता। इससे अफसरों का विकास हो रहा है। रुपया कब आता है और खर्च दिखा दिया जाता है, किसान को खबर भी नहीं होती।