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वीरपाल मायूस, अखिलेश खेमे में जश्न

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Desperate Virpal, Akhilesh party ranks - फोटो : बरेली, अमर उजाला
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पर जीत का दावा कर रहे वीरपाल ने सपा और साइकिल चुनाव चिह्न से उपजी मायूसी स्वीकार करते हुए कहा कि वह  चुनाव जरूर लड़ना चाहते हैं लेकिन इससे पहले बदली परिस्थितियों में वह अपने समर्थकों को बुलाकर राय मशविरा करेंगे। फिर नेताजी (मुलायम सिंह यादव) से बात करने के बाद उनका आदेश लेंगे।  नेताजी जैसा कहेंगे, वह वैसा ही करेंगे। चुनाव आयोग के एक फैसले से सपा का पूरा गणित गड़बड़ा गया। समाजवादी पार्टी और चुनाव चिह्न अखिलेश यादव को देने की चुनाव आयोग की घोषणा होते ही वीरपाल खेमा मायूस हो गया। मुख्यमंत्री के काम और नेता जी के नाम
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पहली जनवरी के लखनऊ अधिवेशन में सीएम अखिलेश यादव के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के बाद बरेली में वीरपाल खेमा खुलकर मुलायम के साथ था। मुलायम के निर्देश पर शिवपाल सिंह यादव ने शहर से राजेश अग्रवाल, कैंट से हाजी इस्लाम बब्बू, बिथरी से वीरपाल सिंह यादव, बहेड़ी से अंजुम रशीद, नवाबगंज से शहला ताहिर, आंवला से महिपाल सिंह, फरीदपुर से डा. सियाराम सागर, मीरगंज से शराफत यार खां और भोजीपुरा से शहजिल इस्लाम को प्रत्याशी घोषित किया था। डा. सियाराम सागर और शहजिल इस्लाम का नाम अखिलेश की सूची में भी था। दोनों विधायक अखिलेश यादव के  साथ रहने की खुलकर घोषणा कर चुके हैं। बाकी सीटों पर शिवपाल समर्थक प्रत्याशियों का चुनाव लड़ना संशय में फंस गया है। चुनाव चिह्न और पार्टी का नाम अखिलेश के पास चले जाने के बाद मुलायम समर्थक निराशा के सागर में डूब गए। सपा के दफ्तर में भी सन्नाटा छा गया। 
इसके उलट अखिलेश समर्थक विधायक अताउर्रहमान, भगवतसरन गंगवार के अलावा जफर बेग आदि ने भी चुनाव चिह्न साइकिल और पार्टी का नाम अखिलेश यादव को मिलने पर पटाखे और आतिशबाजी छुड़ाए और मिष्ठान वितरण कर जश्न मनाया। जश्न मनाने वालों में कदीर अहमद, अरविंद यादव, सूरज यादव, दीपक शर्मा, हसीब खान, रईस मियां, नवाब अख्तर, यूनिस खान, जाफर अल्वी आदि शामिल थे। 
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अखिलेश की हो चुकी समाजवादी पार्टी को अब नए सिरे से जिले में संगठन खड़ा करना है। फिलहाल संचालन समिति की बात चल रही है लेकिन चुनाव आयोग में जीत के बाद संभव है कि बरेली में नया जिला अध्यक्ष नियुक्त कर दिया जाए। यह भी चर्चा है कि बदले समीकरणों में पार्टी शहर और कैंट समेत कुछ टिकटों पर फिर से विचार कर सकती है। कांग्रेस से गठबंधन की संभावनाओं के मद्देनजर भी सपा कुछ सीटों पर दावा छोड़ सकती है। माना जा रहा है दो नेताओं के विवाद में उलझी कैंट सीट या शहर में से एक कांग्रेस को मिल सकती है।

दफ्तर पर भी अब दावा नहीं
इसमें कोई दो राय नहीं कि सपा और साइकिल अब अखिलेश की हो गई। जब दोनों चीजें उनकी हो गईं तो सपा का दफ्तर भी उनका हो गया। हम चुनाव की तैयारी लंबे समय से कर रहे हैं। अब अपने समर्थकों को बुलाकर नए सिरे से रणनीति तय करेंगे। बाकी नेताजी जैसा आदेश करेंगे। वैसा ही करेंगे। वीरपाल सिंह यादव, पूर्व सांसद 

चुनाव आयोग के फैसले के बाद हम पूरी स्थिति की समीक्षा करेंगे। मुलायम सिंह यादव हमसे जो कहेंगे, वही हम करेंगे। अगर वह कहेंगे तो चुनाव लड़ेंगे। अन्यथा नहीं लड़ेंगे। महिपाल सिंह यादव, पूर्व विधायक

हमें तो मुलायम और अखिलेश दोनों ने प्रत्याशी बनाया था। अगर सीएम हमें चुनाव लड़ने लायक समझेंगे तो टिकट देेंगे। हम चुनाव भी लड़ लेंगे। बाकी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। राजेश अग्रवाल, प्रत्याशी शहर 

चुनाव आयोग के फैसले से सच्चाई की जीत हुई है। अब यूपी में केवल एक ही लहर चलेगी, अखिलेश यादव की। सपा अपने कामों के बल पर फिर से सरकार बनाएगी। नेताजी हमारे संरक्षक हैं। चुनाव में हम उनका नाम और पोस्टर का इस्तेमाल करेंगे। अताउर्रहमान, विधायक बहेड़ी 
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