किसानों की अथक मेहनत और नवयुगलों की खुशहाली की प्रतीक है लोहड़ी
बरेली। मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी पर्व मनाया जाता है। यह पंजाबियों के प्रसिद्ध त्योहारों में से एक है। अब तो लोहड़ी की धूम पंजाब में ही नहीं बल्कि देश-विदेश में भी दिखाई देती है। समाज के लोगों के मुताबिक पंजाब के कृषक समुदाय में यह पर्व उत्साह और उमंग का संचार करता है। पर्व के दिन रात को जब लोहड़ी जलाई जाती है तो उसकी पूजा गेहूं की बालियों से की जाती है।
पंजाबी महासभा के अध्यक्ष संजय आनंद ने बताया कि समय के साथ इस पर्व को मनाने के तरीके भी बदले हैं। पंजाब में आज भी जहां यह पर्व परंपरागत तरीके से मनाया जाता है वहीं बरेली में इसमें आधुनिकता भी आ गई है। पंजाब में इस दिन सभी गली मोहल्लों में यह दृश्य आम होता है कि बहुएं लोकगीत गाते हुए घर-घर जाती हैं और लोहड़ी मांगती हैं। महिलाएं जो दुल्ला भट्टी के लोकगीत गाती हैं, उसके पीछे मान्यता है कि शहंशाह अकबर के शासन काल में दुल्ला भट्टी एक लुटेरा था, लेकिन वह हिंदू लड़कियों को गुलाम के तौर पर बेचे जाने का विरोधी था। उन्हें बचा कर वह उनकी हिंदू लड़कों से शादी कराता था। गीतों के माध्यम से उसके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। बरेली में खेत खलिहान हैं नहीं लिहाजा, लोग गुरुद्वारा, पार्क, मैदान आदि में क ार्यक्रम का आयोजन करते हैं।
अग्नि को समर्पित करते हैं खाद्यान्न
बाजारों में भी लोहड़ी की तैयारी सप्ताह भर पहले से शुरू हो जाती है। मूंगफली, तिल के लड्डू, रेवड़ी के अलावा तरह तरह की गजक की बिक्री होती है। यह सभी सामग्री प्रसाद के रूप में रात को लोहड़ी को समर्पित की जाती है। इस सामग्री को ‘तिलचौली’ कहा जाता है। आग में इस सामग्री को डाल कर ईश्वर से धनधान्य से भरपूर होने का आशीर्वाद मांगा जाता है। लोहड़ी मनाने के लिए परंपरानुसार सुबह से ही गुरुद्वारों में लोग जुटने शुरू हो जाते हैं। शाम को कहीं डीजे पार्टी तो कहीं भंगड़ा आदि का आयोजन कर जमकर मस्ती की जाती है। महिलाएं इस पर्व की तैयारी कुछ दिन पहले से ही शुरू कर देती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिए लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। रेवड़ी और मूंगफली वितरण समेत मक्के की रोटी और सरसों के साग का भोज भी आयोजित किया जाता है।