संगीन अपराधों की सजा काट रहे कैदियों को हुनर मिल जाए तो उनके सुधरने की उम्मीद कई गुना बढ़ जाती है। बरेली सेंट्रल जेल में कंबलों की बुनाई करते कैदियों को देखकर यह बात आसानी से समझ आ जाती है। जिस मेहनत से ये अपने काम में जुटे रहते हैं, लगता नहीं कि ये फिर कभी अपराध करेंगे। प्रदेश में सिर्फ बरेली और लखनऊ जेल में बंद कैदियों को ही यह हुनर नसीब है। सूबे की जेलों में बंद कैदियों के लिए कंबल की शक्ल में राहत यहीं बुनी जाती है। हथकरघा के जरिए कंबलों की बुनाई कैदी करते हैं और इन्हें संवारने का काम मशीनों से किया जाता है।
बुनाई प्रशिक्षक प्रदीप कुमार सिंह के मुताबिक, सूबे की 64 जेलों में सजा काट रहे हजारों कैदियों के लिए बरेली सेंट्रल जेल में कंबल बनाए जाते हैं। कैदियों को बदले में पारिश्रमिक भी मिलता है। सजा काट रहे कैदियों को बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। बजट आने के बाद जेल के अंदर कंबल बनाने का प्लांट लगाया गया है। इसमें कैदी हथकरघा से कंबल बनाते हैं। फिर मिलिंग रोलर से इन्हें फिनिशिंग दी जाती है। इसके बाद वाशिंग प्लांट और ड्रायर से गुजारने के बाद एक-एक कंबल की गुणवत्ता जांची जाती है।
इस साल तैयार हो चुके हैं साढ़े बारह हजार कंबल
वरिष्ठ जेल अधीक्षक केदारनाथ के मुताबिक, कंबल का धागा बनाने के लिए ऊन पहले पंजाब से आती थी। इससे कैदी खुद ही धागा बनाते थे। अब कारागार मुख्यालय स्तर पर टेंडर कर धागा मंगवाया जाता है। बरेली सेंट्रल जेल में हर दिन करीब 1800 कंबल बनाए जाते हैं। इस साल कैदी अब तक साढ़े बारह हजार कंबल बना चुके हैं। इन्हें कानपुर, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर, शाहजहांपुर, बदायूं सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 34 जेलों में भेजा गया है।
प्रदेश में सिर्फ दो जेलों में कैदियों के लिए कंबल बनाए जाते हैं। इनमें एक बरेली की सेंट्रल जेल भी है। कैदियों के हुनरमंद होने से सजा खत्म होने के बाद वे अपराध की तरफ दोबारा नहीं मुड़ते हैं।
- केदारनाथ, वरिष्ठ अधीक्षक, सेंट्रल जेल