न आटो चालकों को फोन नंबर, न अन्य कोई जानकारी, इसके बाद भी जीआरपी प्रीपेड बूथ शुल्क के नाम पर गरीब आटो चालकों को दिनदहाड़े लूट रही है। जीआरपी का कहना है कि यह आमदनी राजकोष में जमा होती है। आटो चालक भी परेशान हैं, रुपये न दें तो किसी भी आरोप में बंद कर दिए जाते हैं, जिसके बाद उनकी दोगुनी रकम खर्च होती है।
जंक्शन पर रोजाना करीब ढाई सौ आटो रिक्शा का आवागमन होता है। जीआरपी प्रीपेड बूथ के नाम पर हर महीने सौ से दो सौ रुपये तक हर आटो वाले से वसूलती है, जबकि बूथ का नामोनिशान कहीं नहीं है। एक ओर अंधेरे में बना बूथ सिर्फ नाम को है, कभी कभार वहां जीआरपी कर्मी मिल जाए तो बहुत है, जबकि अन्य स्टेशनों पर मेन एंट्री के सामने बूथ होते हैं, जिससे यात्री उसका फायदा उठा सके। बूथ में न आटो चालकों का नंबर, पता और अन्य विवरण भी नहीं है। इसके बाद भी आटो चालकों से वसूली होती है। यह कहना है कि आटो रिक्शा/टैंपू चालक वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष कृष्ण पाल सिंह का।
बृहस्पतिवार को सैकड़ों आटो चालकों ने डीएम को ज्ञापन देकर जीआरपी से निजात दिलाने की गुहार की। अध्यक्ष ने बताया कि रुपये न देने पर झूठे मुकदमे में फंसाने की साजिश होती है, फिर तो काफी रुपये खर्च हो जाते हैं। जीआरपी इंस्पेक्टर विजय कुमार का कहना है कि प्रीपेड बूथ का रुपया राजकोष में जमा होता है, लेकिन कितना, यह उन्होंने नहीं बताया।