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Bareilly: झूठी रिपोर्ट लिखाने में सीओ, थाना व चौकी इंचार्ज कोर्ट में तलब, 18 अगस्त को देना होगा जवाब

Tue, 15 Aug 2023 06:42 AM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

सार

शख्स ने बेटी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाकर एक युवक के खिलाफ थाना बिथरी चैनपुर में रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष पेश हुई। इसका अध्ययन किया गया तो पता चला कि पीड़िता का इलाज चल रहा है। जबकि पुलिस ने आईपीसी की धारा 306 में रिपोर्ट दर्ज कर ली। 
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बिथरी चैनपुर थाना - फोटो : ट्विटर
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विस्तार
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बरेली में झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने के आरोप में कोर्ट ने सीओ आशीष प्रताप सिंह, बिथरी चैनपुर थाना इंचार्ज अश्विनी कुमार और रामगंगा नगर चौकी इंचार्ज देवेंद्र सिंह को तलब किया है। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि मुकदमा जल्दबाजी में और पेशबंदी के तौर पर प्रतिपूर्ति करने के लिए लिखवाया गया है। इस मामले में पुलिस अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है।

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एसीजेएम रवि कुमार दिवाकर ने अपने आदेश में कहा कि 18 अगस्त को कोर्ट में उपस्थित होकर तीनों अधिकारी यह स्पष्ट करें कि उन्होंने गलत एफआईआर लिखने का आदेश क्यों किया?  न्यायालय यह क्यों न माने कि उनको कानूनी जानकारी का अभाव है? उनके खिलाफ आईपीसी की धाराओं में रिपोर्ट क्यों न दर्ज कराई जाए? इस मामले में आवश्यक कार्यवाही के लिए शासन को क्यों न सूचना दी जाए?

यह है मामला

थाना क्षेत्र के एक गांव निवासी शख्स ने बेटी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाकर शिवाजी नगर निवासी अभियुक्त रवि शर्मा के खिलाफ थाना बिथरी चैनपुर में रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष पेश हुई। इसका अध्ययन किया गया तो पता चला कि पीड़िता का इलाज चल रहा है। उसकी मौत नहीं हुई है लेकिन बिथरी चैनपुर के थाना इंचार्ज ने आईपीसी की धारा 306 में रिपोर्ट दर्ज कर ली। 

इस धारा के अनुसार रिपोर्ट तब दर्ज होनी चाहिए जब आत्महत्या करने वाले की मौत हो जाए और यह आत्महत्या किसी के उकसाने पर की गई हो। इस मामले की तहरीर सीओ आशीष प्रताप सिंह के सामने पेश हुई थी। उनके आदेश पर ही मुकदमा कायम किया गया था। इस पर कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया।

कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

एसीजेएम रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने इस प्रकरण में तीनों पुलिस अधिकारियों पर तल्ख टिप्पणी की। कहा कि पुलिस के झूठे मुकदमे लिखने की वजह से ही देश में सजा का अनुपात बहुत कम है। झूठे मुकदमे लिखने के बावजूद पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होता। इस वजह से झूठे मुकदमे लिखने का चलन बढ़ गया है। झूठा मुकदमा लिखना या न्यायिक अधिकारी को झूठी रिपोर्ट देना भी अपराध है। 
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पुलिस को लगता है कि वह जिस तरह चाहे पेशबंदी के तौर पर मुकदमे को इस्तेमाल कर सकती है। झूठा मुकदमा लिखने से न सिर्फ अभियुक्त बल्कि उसका पूरा परिवार हमेशा भय में रहता है। यह डर ही पुलिस को उसके अन्य मकसद को पूरा करने का सबसे बड़ा साधन है। झूठे मुकदमे से शासन की छवि भी धूमिल होती है।
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