शहर में सन् 2010 में हुए दंगे के बाद कर्फ्यू के दौरान दुकानों में आगजनी, पथराव और एक दुकानदार को जिंदा जलाने की कोशिश करने के सात आरोपियों को अदालत ने शुक्रवार को बरी कर दिया। अभियोजन पक्ष की ओर से इस मामले में अदालत में पर्याप्त साक्ष्य दाखिल नहीं किए जा सके।
दंगे के बाद कर्फ्यू के दौरान आगजनी और पथराव के तीन अलग-अलग मामलाें में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इनमें से एक एफआईआर पुराना शहर में रहने वाले हरचरन लाल ने दर्ज कराई थी जिनका आरोप था कि बासमंडी आयुर्वेदिक कॉलेज के सामने उनका मेडिकल स्टोर था। 2 मार्च 2010 की रात 11 बजे उनके मेडिकल स्टोर में अज्ञात लोगों ने आग लगा दी। इसकी सूचना उन्हें अस्पताल के किसी व्यक्ति से मिली, लेकिन कर्फ्यू लगे होने की वजह से वह मेडिकल स्टोर देखने नहीं जा सके। 4 मार्च को कर्फ्यू में ढील के दौरान मेडिकल स्टोर पर पहुंचे तो पता चला कि उसमें रखा करीब साढ़े चार लाख का माल जलकर राख हो गया।
दूसरी एफआईआर बांसमंडी में रहने वाले कुंदनलाल ने दर्ज कराई थी जिसमें कहा गया था कि 2 मार्च 2010 को शाम पांच बजे उनकी किराने की दुकान में सौ-डेढ़ सौ दंगाइयों की भीड़ पथराव करते हुए घुस गई और आग लगा दी। आसपास के दुकानदार दुकानें छोड़कर भाग गए। पूरे इलाके में अफरातफरी मच गई। कर्फ्यू खुलने पर 4 मार्च को वह रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पहुंचे। बांसमंडी के ही कुक्कू ने एफआईआर दर्ज कराई कि उनकी गिफ्ट आइटम की दुकान कुंदनलाल की दुकान के बराबर है। दंगाइयों ने उनकी दुकान को भी आग लगाकर फूंक दिया। उन्हें भी आग में झोंकने की कोशिश की लेकिन वह जैसे-तैसे बच गए।
पुलिस ने इन मामलों की विवेचना के बाद आजमनगर के निवासी राजा, शब्बु कुरैशी, फैसल, साजिद बेग, शास्त्री मार्केट के कैफी, धौराटांडा भोजीपुरा के कमर व अब्दुल सलाम के खिलाफ चार्ज शीट दाखिल की थी। अभियोजन की ओर से वादी के अलावा एसआई जीत सिंह, रामानंद समेत तीन गवाह पेश किए गए। मुकदमे के वादियों ने अदालत में अपनी गवाही के दौरान आगजनी करने वालों को पहचानने से इन्कार कर दिया। मुकदमे की सुनवाई कर रहे अपर सत्र न्यायाधीश अखिलेश कुमार ने ने अपने फैसले में जनता के किसी व्यक्ति को गवाह न बनाए जाने को भी आधार बनाया और सातों अभियुक्तों को आरोपों से बरी कर दिया।