लॉकडाउन से पहले सामान्य दिनों में फड़ वालों की लगी भीड़।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
अधिकतर फड़ व्यापारी सब्जी-फलों के ठेले लगाने को मजबूर, बढ़ रहा कर्ज
बरेली। कोरोना वायरस ने फड़ व्यापारियों को लगभग तबाह ही कर दिया है। सड़क किनारे खाने पीने के सामान के ठेले लगाकर जो लोग अपने परिवार की गाड़ी खींच रहे थे, अब मजबूर हैं। लॉकडाउन में काम धंधा छिना तो रोटी का भी संकट आ गया। कई फड़ व्यापारियों ने सब्जी और फल के ठेले लगाकर जिंदगी दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश की मगर हजारों की संख्या ऐसी है जिन्हें कोई काम नहीं मिला। फड़ ऐसोसिएशन के मुताबिक, लॉकडाउन में करीब दो करोड़ का फड़ व्यापार चौपट हो गया है। इसमें हजारों की संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं।
शहर में हजारों लोग सड़कों पर दुकान लगा कर अपना व परिवार का पेट पालते थे। बड़ा तबका इनकी दुकानों पर चाउमीन, चाट, छोले, भटूरे समोसे, व अंडे लेता था। इसके अलावा भी तमाम लोग छोटी मोटी दुकानें फुटपाथ पर लगा कर गुजारा करते थे। लेकिन लाक डाउन होने से यह सब बंद हो गई हैं। केवल सब्जी व फल की दुकानें ही लगाने की अनुमति जिला प्रशासन ने दी है। ऐसे में अब इन दुकानदारों ने अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए अपना व्यवसाय बदल दिया है। सैकड़ों लोग सड़कों पर सब्जी व फल बेचने लगे हैं। इससे वह दिन भर में अपने खाने-पीने पर का जुगाड़ आसानी से कर ले रहे हैं। इसी का नतीजा है कि अब मोहल्लों व बाजारों में फल व सब्जी वाले ठेले ज्यादा दिखाई देने लगे हैं। इसके अलावा कई लोगों को तो कुछ भी काम नहीं मिला है। जो जमा पूंजी थी वो खर्च हो गई। अब रिश्तेदारों का कर्ज बढ़ता जा रहा है।
करीब बारह हजार को मिल रही मदद
नगर निगम में चार हजार रिक्शा, करीब साढ़े सात हजार टेंपो और और आठ सौ ई-रिक्शा पंजीकृत हैं। इन्हें शासन के निर्देशानुसार मदद दी जा रही है। हालांकि जो मदद इन्हें दी जा रही है वह ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। जबकि कई चालकों को अभी तक मदद नहीं मिल पाई है। कारण, आरटीओ के पास से लिस्ट तो मिल गई लेकिन संबंधित का नंबर या अन्य डिटेल नहीं मिल पा रही है तो उन्हें किसी तरह तलाश किया जा रहा है।
लॉकडाउन आ गया और इसने हमारी कमर तोड़ दी। हम कर्जदार हो चुके हैं, सैकड़ों की तादात में व्यापारी परिवार भुखमरी की कगार पर हैं। हम इस दौरान सोशल डिस्टेसिंग का हवाला देते हुए काम शुरू करने की गुहार प्रशासन से लेकर जन प्रतिनिधियों तक से लगा चुके हैं लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिली है। यदि यही स्थिति रही तो हमारी हालत इतनी खराब हो जाएगी कि कल्पना नहीं की जा सकती है। - राजेंद्र अरोड़ा, अध्यक्ष, रेडीमेड एवं फड़ एसोसिएशन।
जिला अस्पताल रोड तो कभी गुलाबराय की ओर से फड़ पर दुपट्टे और चश्मे का काम कर रहा था। इस बार भी हमेशा की तरह मार्च में गर्मी को देखते हुए दुपट्टों और चश्मों का अच्छा स्टाक किया था। इधर लाकडाउन हो गया। पहले लगा कुछ दिनों में हट जाएगा लेकिन बढ़ता ही गया और इसने हम जैसे कई फड़ व्यापारियों का काम खत्म कर दिया। हमारे ऊपर कर्जा हो गया, माल खराब हुआ अब दोबारा माल खरीदने की स्थिति में नहीं है। रोटी किसी तरह चल रही है। -राकेश सूरी, जनकपुरी।
सैलानी की तरफ फड़ पर कपड़ा बेचने का काम कर घर चला रहा था, लेकिन अब कोई काम नहीं है। दिनभर काम की तलाश में भटकता हूं, कभी कहीं कोई दो से तीन दिन का काम कर लेता हूं तो कहीं मजदूरी दिहाड़ी कर किसी तरह पैसे जुटाकर रोटी चला रहा हूं। स्थिति गंभीर होती जा रही है लेकिन सुनवाई करने वाला कोई नहीं है। अन्य व्यापार की तरह अगर प्रशासन हमे भी छूट दे दे तो हम काम शुरू करें। ऐसे में कोरोना से भले न मरें लेकिन भूख और कर्ज से मर जाएंगे। -मोहित।
जिला अस्पताल रोड पर चाट, चाऊमीन का ठेला लगाता था। लॉकडाउन हुुआ तो सब काम एकदम बंद हो गया। परिवार में कमाने वाला इकलौता तो समस्याएं भी आने लगी, लेकिन कोई और काम भी नहीं आता था। लॉकडाउन में निर्माण काम भी सब बंद रहे तो मजदूरी भी नहीं मिल रही थी। इधर कुछ दिनों सब्जी बेची। अभी कुछ दिनों से मास्क बेच कर किसी तरह रोटी चला रहा हूं। -सतीश।