एडीएम सिटी आलोक कुमार ने कहा कि किसी भी अभिभावक को स्कूल संचालक एक दुकान से किताब और ड्रेस खरीदने के लिए बाध्य न करें। दस दिन में सभी स्कूल व्यवस्था में सुधार कर लें। मनमानी करने वालों को नोटिस देकर मान्यता रद्द की जाएगी।
वह बृहस्पतिवार को विकास भवन सभागार में अभिभावक संघ और स्कूल के प्रतिनिधियों की बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अभिभावक संघ के अध्यक्ष अंकुर सक्सेना के अलावा उनके पास और भी तमाम शिकायतें आ रही हैं। अभिभावकों का कहना है कि स्कूल मनमानी करते हैं। चुनिंदा दुकानों से किताबें और ड्रेस खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है। फीस को लेकर भी स्कूलों की स्थिति साफ नहीं है। ऐसा नहीं होना चाहिए। किसी अभिभावक को बाध्य नहीं किया जाए। स्कूलों के संचालक अभिभावकों को मोनोग्राम दें, ताकि वह कहीं से कपड़ा खरीदकर ड्रेस सिलवा लें। किताबों के साथ जबरन स्टेशनरी नहीं बेची जानी चाहिए। जो अभिभावक अपनी इच्छा से ले उसी को स्टेशनरी दें। साथ ही शिक्षा के अधिकार के तहत स्कूलों में 25 फीसदी दाखिले किए जाएं। इसमें स्कूल से बच्चों के घर की दूरी का कोई मानक नहीं है। मनमानी किसी को नहीं करने दी जाएगी। बैठक में तय होने वाली बातों पर अमल न करने वाले स्कूलों को नोटिस देकर मान्यता रद्द कर दी जाएगी।
यह हैं बैठक की मुख्य बातें
-पिछले साल प्रशासन के साथ बैठक में तय हुआ था कि हर स्कूल में एक पब्लिक रिलेशन आफीसर नियुक्त होगा। ताकि अभिभावकों की समस्याओं का समाधान हो सके। हालांकि किसी स्कूल ने अभी तक पीआरओ नियुक्त नहीं किया है।
-पिछले तीन सालों में जिन स्कूलों ने फीस में बढ़ोत्तरी की है। वह उसका औचित्यपूर्ण कारण स्पष्ट करें। सीबीएससी और आईसीएससी बोर्ड के नियमों में फीस बढ़ाने के लिए कोई स्पष्ट नहीं है। उसमें यह कहा गया है कि स्कूल सुविधाओं से हिसाब से फीस ले सकते हैं, जबकि फीस बढ़ाने के लिए एक कमेटी बननी चाहिए, जिसमें दो अभिभावक भी शामिल होंगे।
-विद्यालय में कक्षावार फीस लेने का डिस्प्ले किया जाता है या नहीं? क्योंकि अभिभावकों की फीस से संबंधित शिकायतें रहती हैं। फीस कहीं डिस्प्ले नहीं होती है। फीस बुक में ही कुछ स्कूलों ने यह व्यवस्था कर रखी है। बैठक में फीस डिस्प्ले करने को कहा गया है।
-विद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए सीटों की डिटेल पहले से डिस्प्ले करा दी जाएगी। इससे 50 सीटों के लिए सैकड़ों लोग लाइन में नहीं रहेंगे। जरूरतमंद बच्चों को आसानी के दाखिला भी मिल जाएगा।
-अभिभावकों को एक दुकान से किताबें खरीदने को बाध्य नहीं किया जाएगा। एक स्कूल की कम से कम तीन दुकानों पर किताबें मिलेंगी। ताकि अभिभावक जहां से चाहें किताबें खरीद पाएंगे। किताबें आनलाइन से भी खरीदने की व्यवस्था होगी।
-शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के तहत स्कूलों को 25 फीसदी बच्चों के दाखिले लेने होंगे। इसके लिए आनलाइन आने वाले आवेदनों पर स्कूल संचालकों को संज्ञान लेना होगा। स्कूल संचालक उन्हीं का दाखिला करें, जिनके पास प्रशासन का आय प्रमाण पत्र होगा।
एडीएम ने डीआईओएस को सौंपी जांच
सेंट मारिया की आठवीं में फेल होने वाली एक लड़की का मुद्दा भी बैठक में उठा। एडीएम ने स्कूल की प्रतिनिधि से छात्रा के फेल होने की वजह पूछते हुए कहा कि उसके परिवार वालों की शिकायत आई है। स्कूल की प्रतिनिधि ने बताया कि दो बार हम छात्रा का री-एग्जाम करा चुके हैं। किसी विषय में पास नहीं हो पाई है। इस पर जेडी शिव प्रकाश द्विवेदी ने कहने लगे कि पूरे साल पढ़ने के बाद छात्रा सारे विषयों में फेल कैसे हो गई। आठवीं तक किसी को फेल किया ही नहीं जा सकता है। एडीएम कहने लगे पास करिए उसे। इस पर स्कूल प्रतिनिधि ने फिर से दिखवाने को कह दिया। उधर, एडीएम ने पूरे मामले की जांच डीआईओएस को सौंप दी है।
एनसीआरटी की एजेंसी खुले
अभिभावक संघ के अध्यक्ष अंकुर सक्सेना का आरोप था कि कक्षा एक से आठ तक एनसीआरटी की किताबें नहीं लगाई जाती हैं। साइंस की कि ताब पर एक ही साल में 130 रुपये की बढ़ोत्तरी कर दी गई। चिटें लगाकर किताबों के दाम बढ़ा दिए जाते हैं। रिफरेंस बुक मनमाने तरीके से थोप दी जाती है। इंडिपेंडेंट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष पारस अरोड़ा, चिक्कर इंस्टीट्यूट से विन्नी चिक्कर, सेक्रेट हार्ट के निर्भय वेनीवाल, अलमा मतेर के राजीव ढींगरा, एसआर इंटरनेशनल की अल्पना जोशी, डीपीएस की रंजनी सिंह, जिंगल बेल्स की सेजल पटेल और अंकित बग्गा ने इसका विरोध किया। कहना था कि एनसीआरटी कंप्यूटर, साइंस, संस्कृत और जीके की किताबें नहीं दे पाती है। बाकी किताबों की डिमांड देर से आई। यहां एनसीआरटी जब तक एजेंसी नहीं खोलेगी, समस्या का समाधान नहीं होगा।