फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गैर जिम्मेदार हाथों में शहर, इसलिए टूट रहा प्रदूषण का कहर

विज्ञापन
विज्ञापन
बरेली। शहर को स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त बनाकर लोगों को शुद्ध वायु मुहैया कराने में सिस्टम लापरवाह बना हुआ है। प्रशासन, सेतु निगम, नगर निगम, प्रदूषण विभाग समेत अन्य विभागों के अफसरों का रवैया खुद ही सवालों के घेरे में है। एनजीटी की गाइडलाइन का अनुपालन कराना तो दूर खटारा वाहनों का प्रदूषण रोकने में भी अफसर एक दूसरे विभाग पर जिम्मेदारी थोपने में पीछे नहीं हैं। यही वजह है कि शहरवासियों को शुद्ध हवा और पानी नसीब नहीं हो रहा है। ग्रीनपीस इंडिया की रिपोर्ट में बरेली की चिंताजनक स्थित के बाद भी सिस्टम इस ओर ध्यान नहीं दे रहा।
विज्ञापन

आरटीओ: आयुक्त ने कहा अभियान चलाओ.. विभाग चुप
पिछले दिनों परिवहन आयुक्त ने सूबे में महज दस फीसदी वाहनों का ही प्रदूषण में चालान होने पर एतराज जताया था। उन्होंने 20 से 25 जनवरी तक वाहनों की सघन चेकिंग करने के सख्त निर्देश भी दिए थे, लेकिन अफसर ट्रैफिक वाहनों की सघन चेकिंग में पुलिस से सहयोग मांगने की बात कह रहे हैं। ट्रैफिक पुलिस का जवाब न मिलने से स्कूल वाहनों के प्रदूषण सर्टिफिकेट की जांच करने का दावा किया है। वाहनों के फर्जी प्रदूषण प्रमाण पत्र जारी करने के मामले में पिछले दिनों रोडवेज के ड्राइवरों ने भी सवाल उठाए थे। आरोप था कि पीयूसी केंद्रोें पर फर्जी प्रमाण पत्र बनाए जा रहे हैं, जिसपर दिल्ली में चालान काटे जा रहे हैं। मामले पर अफसरों ने पीयूसी केंद्रों का औचक निरीक्षण का दावा किया था, लेकिन अब तक निरीक्षण नहीं हो सका है।
नगर निगम: न कूड़ा उठ रहा और न ही प्लांट चल रहा
शहर को प्रदूषण मुक्त बनाने में बड़ी जिम्मेदारी नगर निगम की भी है। करीब साल भर तक मेयर और नगर आयुक्त के बीच चली तनातनी से शहर में गंदगी का अंबार लगा रहा। डोर-टू-डोर योजना के लिए दस करोड़ का भारी भरकम बजट के अनुमोदन से मेयर के इनकार के चलते कचरा सड़कों पर पसरा रहा। फिर बाकरगंज ट्रंचिंग ग्राउंड भी कुछ दिन तक चलने के बाद ठप हो गया। रजऊ परसपुर स्थित सॉलिड वेस्ट प्लांट चलाने का नगर आयुक्त ने दावा किया, लेकिन वह भी हवा-हवाई रहा। वहीं, पराली जलाने को लेकर जिले भर के डेढ़ सौ अफसरों और कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई, उसी दौरान नगर निगम में जगह-जगह कूड़ा जलाया जाता रहा। बताया जाता है कि डलावघर में खुद नगर निगम के सफाईकर्मी ही कूड़ा जलाते हैं।
विज्ञापन

बीडीए: धुंध से घुट रहा दम, खुले मेें फैला है रेता बजरी
पर्यावरणविद् के मुताबिक शहर से काफी ऊंचाई पर हुई धुंध की पर्त बिछी हुई है। जिसकी मुख्य वजह निर्माण सामग्री का खुले में रखना। खुले में रखी गई निर्माण सामग्री रेता बजरी आदि को ढंककर न रखने पर संबंधित के खिलाफ एनजीटी ने कार्रवाई के निर्देश थी दिए हैं, लेकिन अब तक बीडीए की ओर से खुले में निर्माण सामग्री रखने पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। लिहाजा, धुंध की परत बिछने से प्रदूषण से लोगों का दम घुट रहा है।
प्रदूषण विभाग: कार्रवाई के बजाय टालमटोल का खेल
प्रदूषण मुक्त शहर बनाने की प्राथमिक जिम्मेदारी प्रदूषण विभाग की है, लेकिन जवाबदेही से बचने के लिए विभाग के जिम्मेदार दूसरे विभागों को बस नोटिस थमा रहे हैं। पिछले दिनों रामगंगा नदी में गिर रहे एक चीनी मिल की गंदगी को हटाने के लिए आईजीआरएस पर शिकायत हुई। प्रदूषण विभाग ने चीनी मिल के खिलाफ एक्शन लेने के बजाय बाढ़ खंड विभाग को गंदगी साफ करने के लिए पत्र भेजा। बाढ़ खंड विभाग ने नदियों में गिर रहे कचरे को साफ कराने की जिम्मेदारी नगर निगम को बताते हुए प्रदूषण विभाग को पत्र वापस कर दिया। मामले पर प्रदूषण विभाग ने अब प्रशासन को पत्र भेजकर कार्रवाई की इतिश्री कर ली और नदियों में कचरे का ढेर लगता जा रहा है।
सेतु निगम: अधूरे प्रोजेक्ट से सांस लेना हुआ मुश्किल
शहर में चौतरफा आधे-अधूरे निर्माण कार्य भी प्रदूषण की बड़ी वजह है। एनजीटी की गाइडलाइन के मुताबिक अधूरे प्रोजेक्ट या काम बंद होने पर निर्माण सामग्री पर पानी का छिड़काव कर उसे ढंककर रखा जाना चाहिए। ताकि वाहनों की आवाजाही से रेता बजरी, मिट्टी आदि के गुबार हवा में न घुलें। लेकिन सेतु निगम के अफसर इससे बेपरवाह बने हुए हैं। पांच साल से लाल फाटक फ्लाईओवर, साल भर से सैटेलाइट और चौपुला, तीन साल से आईवीआरआई फ्लाईओवर का निर्माण चल रहा है। पर्यावरणविद के मुताबिक शहर को प्रदूषित करने में सेतु निगम की बड़ी लापरवाही सामने आ रही है।
जिला प्रशासन: निगरानी न होने से बढ़ रहा प्रदूषण का ग्राफ
शहर में बढ़ते जा रहा प्रदूषण के पीछे प्रशासन की ढुलमुल व्यवस्था भी है। दीवाली पर आतिशबाजी रोकना हो या शहर में जल रहे कूड़ा पर रोक लगाने के लिए ठोस पहल.. हर जगह प्रशासन नाकाम साबित हो रहा है। सेतु निगम, बीडीए, आरटीओ हो या अन्य विभागों से मानकों का पालन कराने में भी प्रशासन की स्थिति चिंता जनक है। पिछले दिनों पराली पर कार्रवाई की, मगर धूल के कणों को कम करने के लिए खुले में रेता बजरी रखने पर कोई एक्शन नहीं लिया गया।
वन विभाग: छंटाई के नाम पर काटे जा रहे पेड़
सर्द मौसम शुरू होने के साथ ही वन विभाग से लोगों ने पेड़ों की छंटाई की परमिशन लेकर सालों पुराने पेड़ ही काट डाले, लेकिन कार्रवाई के नाम पर वन विभाग ने बस नोटिस जारी किया। कुछ मामले चर्चा का विषय बने तो दवाब में आकर कार्रवाई भी की। वहीं, वन विभाग की ही रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल हुए पौधरोपण में 30 फीसदी पौधे सूख गए। भारी भरकम बजट खपाने के बाद भी बड़े पैमाने पर पौधों का सूखना भी अफसरों की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा रहा है।
पुलिस: अतिक्रमण से रेंग रहा ट्रैफिक, हवा में घुल रहा धुआं
एक बार अतिक्रमण हटाने के बाद दोबारा वह न बसे इसकी जिम्मेदारी पुलिस की रहती है। पिछले दिनों शहर में नगर निगम ने कई बार शहर के कई इलाकों से अतिक्रमण हटाया, लेकिन वह फिर हावी होता चला गया। अतिक्रमण के चलते सड़कें चौड़ी होने के बावजूद संकरी हो चलीं हैं। इससे आए दिन जाम भी लग रहा है, रेंग-रेंग कर चल रहे वाहन प्रदूषण का ग्राफ बढ़ा रहा है। लेकिन पुलिस महकमा इस जाम को दूर कराने में नाकाम साबित हो रहा है।
पहले जारी किया नोटिस अब बैकफुट पर
शहर में बढ़ते जा रहे प्रदूषण के बाबत बरेली कॉलेज के बॉटनी विभाग के एमिनेंट प्रोफेसर डॉ. डीके सक्सेना ने अक्तूबर में अलर्ट जारी किया था। उन्होंने शहर में प्रदूषण के मानक पीएम-10 का आंकड़ा चार सौ से ज्यादा निकलने की बात कही थी। इस पर प्रदूषण विभाग ने प्रोफेसर को गलतबयानबाजी का आरोप लगाते हुए पर नोटिस भी जारी किया था। प्रशासन समेत अन्य विभागों को भी संबंधित मामले में पत्र लिखा था। हालांकि, अब ग्रीन पीस इंडिया की रिपोर्ट सामने आने के बाद प्रदूषण विभाग ने चुप्पी साध ली है। बताया जाता है कि प्रदूषण विभाग के अफसर प्रोफेसर से संपर्क कर बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए उपयुक्त प्रयास संबंधी जानकारी के लिए राय मांगी है।
आठ घंटे में काला पड़ गया फिल्टर पेपर
शहर में प्रदूषण का लेवल किस कदर बढ़ रहा है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण शहर के विभिन्न स्थानों पर लगाए गए यंत्र बता रहे हैं। गुरुवार को प्रोफेसर डीके सक्सेना के शोधछात्र ने प्रभा टाकीज के पास सुबह लगाए गए प्रदूषण मापक यंत्र से फिल्टर पेपर को निकाला तो वह काला पड़ चुका था। फिल्टर पेपर में जमा कालापन आठ घंटे में दर्ज हुआ है, जो पीएम 2.5 बताता है। सफेद रंग का पेपर पूरी तरह काला होने के बारे में पूछा गया तो प्रोफेसर ने बताया कि एक ओर रेंग रहा ट्रैफिक दूसरी ओर, उड़ रहा धूल का गुबार बड़ी वजह है। उन्होंने सैटेलाइट और चौपुला पर हो रहे निर्माण कार्यों के चलते उड़ रहे धूप से भी प्रदूषण का ग्राफ बढ़ने की बात कही है।
विज्ञापन

बरेली में प्रदूषण का ग्राफ
इलाका दिसंबर जनवरी
इज्जतनगर 350 220
आईवीआरआई 370 250
चौपुला 400 301
सिविल लाइंस 270 180
सैटेलाइट 410 310
नोट: पीएम-10, दिसंबर और जनवरी माह का एक्यूआई 90 (एयर क्वालिटी इंडेक्स)।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें